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ये उन दिनों की बाते हैं

ये उन दिनों की बाते हैं

नहीं आती है ,
मुंडेर पर अब
वह खिली धूप
कहाँ खिलते हैं,,
वो दरवाजे पर बोगनवेलिया
वो रात की रानी …

नहीं दिखता अब तो
वो बाड़ी भी ,,
वो पेड़ों पर अमरूद ..

कनैल देखे तो
एक अरसा हो गया ..

नहीं बनते हैं अब
वो आँवले के पेड़ों के नीचे
उपले पर ,,,
देशी घी का खाना ..

कहाँ दिखता है अब
वो दूध का उबलना
उस बड़े से कड़ाह में
इतना बड़ा कि हम उसमें
आराम से बैठ जाएँ …

नहीं दिखता है अब
वो खलिहान
गाय बैलों की कतारें
एक खूंटे में सभी का घूमना
मुँह पर मास्क सा कुछ
याद नहीं,
पर जिसे शायद__
जाबी कहते थे
सामने अनाज होते हुए भी
नहीं खा पाते थे बेचारे …

वो धान के
गेहूँ के बोझों के टीले
वो थ्रेसर भी ,,
जिसमें बालियाँ डालना आह्हा..
और वो
दूर दूर तक उड़ते हुए गेहूँ के भूसे …

नहीं दिखती हैं अब
वो कंसारन
जहाँ से हम
धान के बदले
मुरमुरे लाया करते थे..

कहाँ गुम हो गई
बरामदे की वो रौनकें
वो कहकहे
वो शरारतें
जब शाम ढलते ही
शुरू हो जाया करती थी __
बातों का सिलसिला
लाईट होते हुए भी
वो पीली रोशनी वाला बल्ब
बुझा दिया जाता था
इसीलिए कि,
राह चलते लोगों की नज़र
न पड़े हम पर ,,,
बस हँसी गुँजा करती थी हवाओं में..

पसीने से तरबतर होते थे,
पर कहाँ अहसास होता था
गरमी का..
हाथ पंखे
कभी इस हाथ
कभी उस हाथ
ये उन दिनों की बाते हैं
जब सुविधाएं कम थी
पर सुकून बेशुमार था…

हाँ ,,,,
ये उन दिनों की बाते हैं …….. !

सुष्मिता महथा, दिल्ली

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