साहित्य का सोपान

अपने-अपने हिस्से का…

साहित्य का सोपान

अपने-अपने हिस्से का सब मुझमें जीते रहे
मैं अकेली यूं ही फिर मरती रही
अपने-अपने हिस्से का सब अहसास कराते रहे
मैं अकेली यूं ही अहसान जताती रही
अपने-अपने हिस्से का दर्द सब मुझे देते रहे
मैं अकेली यूं ही फिर तड़पती रही
अपने-अपने हिस्से का सब किस्सा बनाते रहे
मैं अकेली फिर यूं ही कहानी बनाती रही
अपने-अपने हिस्से का सब मुझे लेते गये
मैं अकेली यूं ही मुझको हम बनाती रही
अपने-अपने हिस्से का सब ख्वाब दिखाते रहे
मैं अकेली यूं ही फिर उन्हे बुनती रही
अपने-अपने हिस्से का सब बिखराते रहे
मैं अकेली यूं ही टुकड़े उठाती रही
अपने-अपने हिस्से का शर्ते बताते गये
मैं अकेली यूं ही फिर उन्हे निभाती गई
यूं तो अहसासों की कमी ना थी हिस्से में मेरे
मैं अकेली यूं ही फिर अल्फाज़ों में उन्हे पिरोती रही
अपने-अपने हिस्से का सब मुझमें जीते रहे
……बसंती सामन्त
उत्तराखंड

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