साहित्य का सोपान

चोला…

साहित्य का सोपान

चोला ( लघुकथा )

” माँ , चाय बना दो जल्दी से …” उनींदे विभू ने सोफ़े पर लेटते हुए कहा और मोबाइल चालू कर लिया ।
रमा के सब्जी काटते हुए हाथ रुक गए । अधूरी कटी सब्जी टेबिल पर छोड़कर वह रसोई में गईं । गैस चालू की और चाय की भगोनी चढ़ा दी । तभी पति की तेज़ आवाज़ सुनाई दी ,
” देख रहा हूँ दिन-पर-दिन बहुत आलसी होते जा रहे हो । बिस्तर छोड़कर उठे तो यहाँ सोफ़े पर आकर लोट गए । ”
” क्या हुआ जी ? सुबह-सुबह इतना क्यों चिल्ला रहे हैं ?” रमा भीतर से ही तेज़ आवाज़ में बोली ।
” चिल्ला नहीं रहा हूँ , समझा रहा हूँ इसे । अब ये छोटा बच्चा नहीं रहा । बताओ भला , ये कोई उम्र है , हर घड़ी लोट लगाने की ? ” कैलाश बाबू गुस्से में बड़बड़ाते हुए समाचार पत्र लेकर कुर्सी में धँस गए ।
” हर घड़ी लोट लगाने की मतलब ? कैसी बात करते हो पापा ? मेरी कोचिंग सुबह आठ से रात आठ बज़े तक होती है । आने-जाने के एक – डेढ़ घण्टे अलग । फ़िर कौन सा आकर सो ही जाता हूँ ? रिवीज़न भी तो करना पड़ता है । ” चाय आ चुकी थी । विभू मोबाइल टेबिल पर रखकर आलथी-पालथी मारकर बैठ गया था । उसके शब्द इतने शांत थे , मानो वह इस सबका अभ्यस्त हो ।
” अरे तो क्या हुआ… जैसे हमने तो पढ़ाई की ही नहीं । वैसे ही बड़े हो गए । अरे… सुबह-सुबह का समय है । ये नहीं , थोड़ा वर्जिश करे , बाहर नहीं जा सकता तो छत पर जाकर टहल ले । पर नहीं … ज़नाब बिस्तर से उठे तो सोफ़े पर पोड़ गए । न कोई दुआ-सलाम , न राम-राम । मानो पढ़ाई और मोबाइल ही रह गया दुनिया में…” समाचार पत्र की घड़ी अभी तक नहीं खोली थी कैलाश बाबू ने । डाँटते हुए लहराते हाथों के साथ अब वह भी लहराने लगा था ।
” ओफ्फो… अब बस भी करो । रोज़-रोज़ एक ही रट लगाकर बैठ जाते हो सुबह से । ये नहीं लड़का जवान हो रहा है । दो घड़ी हँसकर ही बात कर लो । ” आटा सने हाथों से ही रमा बाहर आ गई थी ।
” रट नहीं लगाता हूँ । दुनियादारी सिखाता हूँ , पर तुम माँ-बेटे मेरी चलने दो , तब न …सच कह रहा हूँ रमा , इसे बिगाड़ने में पूरा तुम्हारा ही हाथ है । तुम्हारी ही शह पर ये इतना लापरवाह होता जा रहा है । ” पेपर की तह झटके से खोलते हुए कैलाश बाबू झल्ला रहे थे ।
” अच्छा , अब आप दोनों अपनी चिकचिक बन्द भी करो । ” चाय का कप टेबिल पर रख कर विभू बाथरूम में घुस गया । रमा ने भी रसोई में अपने हाथ तेज़ी से चलाना शुरू कर दिए ताकि विभू के तैयार होकर आने तक टिफ़िन तैयार हो जाए ।
” माँ , टिफ़िन दे दो जल्दी से । ”
” ये ले टिफ़िन और पानी की बोतल ”
” थैंक यू माय डियरेस्ट मॉम …” कहकर विभू ने माँ के गले में बाहँ डाल दी । तभी रमा की नज़र टेबिल पर रखे जूठे कप और सोफ़े पर पड़े गीले टॉवल पर चली गई ।
” विभू , क्या है ये ? अपना जूठा कप क्यों नहीं रखा सिंक में ? और कितनी बार कहा है , गीला टॉवेल यहाँ-वहाँ मत पटका कर । ” कैलाश बाबू रमा के भीतर समा चुके थे ।
” आकर उठा दूँगा माँ , अभी देर हो रही है । ” कहकर वह पोर्च से स्कूटर निकालने लगा । आवाज़ में बेफ़िक्री साफ झलक रही थी ।
” दिनभर ऐसे ही पड़े रहेंगे … हाथ कि हाथ क्यों नहीं रखता ? ” रमा भी बड़बड़ाते हुए बाहर चली आई थी ।
” क्या हुआ , क्यों इतना शोर मचा रही हो ? एक कप ही तो छोड़ा है …तुम ही उठा लो । क्यों आसमान सिर पर उठा रही हो ? ” कैलाश बाबू भी गीला टॉवेल हाथ में लिए बाहर आ गए थे ।
” तुम जाओ बेटा , देर हो रही होगी । तुम्हारी माँ की तो आदत है जब तक सुबह-सुबह दो -चार सुना न ले , तब तक चैन नहीं पड़ती । ”
रमा हाथ बाँधे दरवाज़े से टिककर देख रही थी । बेटा स्कूटर स्टार्ट करते हुए पिता की बात सुनकर मुस्कुरा रहा था और कैलाश बाबू गीला टॉवेल बाहर बंधी रस्सी पर बहुत हल्के हाथों से फैलाते हुए उसका एक-एक सल निकाल रहे थे ।
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शशि बंसल गोयल
J – 61 , गोकुलधाम
भोपाल – 462038
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परिचय
शशि बंसल गोयल, भोपाल की रहने वाली हैं। शिक्षा के पेशे के बाद आल इंडिया रेडियो में कार्यरत हैं। आपको कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के साहित्यिक पुरुस्कार और सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। अनेक पत्र पत्रिकाओं सहित अन्य माध्यमों से आपकी रचनाओं का प्रकाशन और प्रसारण होता रहा है। पांच साझा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।
संपादक
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समीक्षा
लघु कथा….यानि गागर में सागर को समेटने की कला… बात “चोला” मतलब आवरण की… । तरह तरह के आवरण ओढ़कर जीने की प्रवृति को उजागर करती कहानी को जन्म मिला है शशि बंसल की कलम से…। जो आज के मानव के दोहरे चरित्र जीने की आदत को रेखांकित करती है। या यूं भी कहा जा सकता है कि भूमिका बदलते ही मानव की मानसिकता बदल जाती है…। शायद यही वजह है कि आज के मानव की वाणी में वह प्रभाव नहीं रहा क्योंकि जो वह कह रहा है उस पर वह खुद कभी अमल नहीं करता। इसका परिणाम होता है ….
एक कंधे पर सौ सौ चेहरे फिर भी उदासी है…..।
जीवन में बढ़ती उदासी को भी यह कहानी अपने तरीके से परिभाषित कर रही है। साथ ही दाम्पत्य जीवन की होने वाली खटपट के कारणों पर भी प्रकाश डाल रही है। जिन कारणों के चलते दाम्पत्य जीवन की शांति भंग होती है। साथ ही संतान के लालन पालन में बरती जा रही लापरवाही की तरफ भी ये कहानी इशारा करती है कि आज की पीढ़ी की तुलना अपने जमाने से करने की भूल अधिकांश मां बाप कर रहे हैं। बच्चों के सामने पति पत्नी के वाक युद्ध से बालमन कितना प्रभावित होता है इसका ध्यान भी कहानी के नायक नायिका नहीं रख रहे हैं।
… इन सभी बिंदुओं को एक लघु कथा में समाहित करने का भागीरथी प्रयास लेखिका ने किया है। एक कमरे में शुरू होकर खत्म हुई इस कहानी में मात्र तीन पात्र हैं। बेटा विभु और उसके माता पिता रमा और कैलाश बाबू ….। रमा और कैलाश बाबू परिस्थिति बदलते ही वह आचरण कर रहे हैं जिसके लिए कुछ समय पहले ही दूसरे को टोक रहे थे। उनकी नोंक झोंक के बीच विभु अपने हिसाब से ही जिंदगी जी रहा है …लापरवाही वाली….संस्कार विहीन ….। सरलता के साथ बहुत से संदेशों को अपने में छिपाए यह कहानी समाज के लिये गाइड की भूमिका निभा रही है। और बता रही है कि
मुखोटे लगाकर जीने की बुरी आदत को कम से कम पारिवारिक जीवन से दूर रखा जाए…। शानदार कहानी के लिए शशि जी बधाई।
शैलेश तिवारी, संपादक

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