साहित्य का सोपान

आतर्नाद

साहित्य का सोप‍ान

आतर्नाद

किसी मृतक पर मेरा नाम होगा
किसी ध्वस्त विग्रह का अपमान होगा
आज समाज मेंं घृणित हैं कृत्य इतने कि
एक दिन नरभक्षी का ही गुणगान होगा ।

क्रंदन होगा श्मशान मेंं प्रतिध्वनित तभी
उष्ण धुएँ मेंं वेदनाएं होगीं द्रवित तभी
करुण आर्तनाद करेंगी अस्थियाँ
वृक्ष जलेगा , जलेंगीं कुमारियाँ
इस सृष्टि का अंत है निश्चित तभी ।

हीन मानसिकता होगी सौंदर्य की परिभाषा
होगा लुप्त मानस चक्र , बदलेगी अंतर्भाषा
किंवदंती मेंं होंगीं तरुवर व तरुणी ,
कथाएँ लिखेंगी विध्वस्त अरुणी ,
धन्य ये आधुनिकता ! धन्य ये विज्ञान की मृषा !

शब्द मेरे अस्पृश्य क्यूँ लगतें हैं ?
क्यूँ अश्रुओं मेंं बहते घुलते लगतें हैं ?
क्या मैं मर चुकी हूँ नारीत्व के अभिमान मेंं ,
शिशुता से यौवन पर्यंत के उपमान मेंं ,
क्यूँ जीवन के सपनें असहिष्णु लगतें हैं ?

….अनिमा दास
कटक, ओड़िशा

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