समसामयिक

आराम करो..

आराम करो

आजकल का समय बहुत ही अच्छा है। अगर आदरणीय गोपालप्रसाद व्यास जी की बातों पर अमल किया गया होता, तो आज के हिंदुस्तान की ….. माफ़ कीजिए भारत की हालत इतनी ख़राब नहीं होती। आप पूछेंगे कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ? भाई बात तो बहुत सरल सी है। अगर हमारे देश का प्रधानमंत्री कोई कवि होता, तो सच मानिए कि हम कोरोना जैसी बीमारी के सामने घुटने कभी नहीं टेकते। बेकार ही इस आदमी ने दिन-रात एक कर दिया है , मगर रिज़ल्ट क्या निकला ? बाबा जी का ठुल्लू! इस अहिंसा प्रधान देश में कोरोना के खिलाफ़ हिंसात्मक शब्दों के उपयोग की बिल्कुल भी जरूरत नहीं पड़ती।

बहुत बार कहा गया है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है, लेकिन यहाँ मैं कहना चाहूँगा कि हम जैसे होते हैं, साहित्य भी वैसा ही होना चाहिए। और साहित्य सृजन के लिए यह बहुत जरूरी हो जाता है कि मनुष्य के पास पर्याप्त समय हो। लेकिन वर्तमान दौर का मनुष्य तो साहित्य की और स्वास्थ्य की चिंता बिल्कुल भी नहीं करता है। मूर्खों की तरह काम….काम….और काम ही जीवन का लक्ष्य बना रखा है । ज्यादा काम करने के बाद भी क्या जीडीपी को नीचे गिरने से रोक सके ? नहीं । लेकिन किसी ने इस बारे में नहीं सोचा कि देश की ऐसी हालत हुई तो आखिर हुई कैसे ?

शिक्षा जीवन में बहुत जरूरी है इस बात से बिल्कुल भी इन्कार नहीं किया जा सकता । लेकिन कागज की डिग्रियों वाली शिक्षा के कारण ही इस देश का बंटाधार हुआ है। अगर इस देश के डॉक्टर और इंजीनियर इस बात को सही से समझ गए होते कि शिक्षा का मतलब क्या होता है, तो आज इस देश के बच्चे हर समय आंखों पर चश्मा लगाए हुए न घूम रहे होते । अब तो मुई पढ़ाई की वजह से छोटे-छोटे बच्चे ऐसे लगते हैं जैसे अपनी आंखों पर चश्मे चढ़ाकर , पैदाइशी चश्मे की दुकान से उनका कोई संबंध हो । प्यारे-प्यारे मासूम चेहरों पर काले-काले चश्मे। ऐसे बच्चों को देखकर डर लगने लगता है। बचपन में कार्टून की किताबें पढ़ीं थीं ….. कभी-कभी तो भ्रम हो जाता है कि कोई कार्टून किताब का करैक्टर ही किताब से बाहर निकल आया है। आंखों के कमजोर होने का कारण है कि मां- बाप ने अच्छी खुराक नहीं ली थी, अगर माँ-बाप ने बच्चे के निर्माण में अच्छी क्वालिटी के मैटेरियल्स इस्तेमाल किए होते तो इस ह्यूमन इंजीनियरिंग का रिजल्ट भी टॉप क्लास का आता । लेकिन आजकल के नालायक मां-बाप को कौन समझाए। आजकल के माँ-बाप तो सिर्फ़ और सिर्फ़ फैशन के दीवाने हैं, उन्हें अपने खाने- पीने से क्या लेना, चिड़िया जैसा पेट बनाकर रखने की एक बुरी बीमारी आदमियों में पाई जाती है, जिसके कारण ऐसे कुपोषित आंखों वाले बच्चे पैदा होते हैं। आप सोच रहे होंगे कि मैं आज आपको यह इंजीनियरिंग क्यों पढ़ा रहा हूँ?

दरअसल बात यह है कि मैं इस देश की देखने की क्षमता से बहुत परेशान हूँ। इस देश की आंखों पर चश्मा चढ़ा हुआ है, और चश्मा चढ़े होने का कारण है कि इस देश के लोगों ने दादा गोपालप्रसाद व्यास जी की बातों पर अमल नहीं किया है। अगर अपने बुजुर्ग लोगों की बातों को हम लोगों ने माना होता, तो मैं पूरी गारंटी के साथ कह सकता हूँ कि भारत की हालत कभी भी इतनी बुरी नहीं होती। इस देश के लोगों की सबसे बड़ी कमी यही है कि यहाँ के लोग कागज की डिग्रियों को पाने के लिए अपनी आंखें फोड़ते हैं, लेकिन ज्ञान की बात नहीं करते।

इस देश का पाठ्यक्रम चाहे इंजीनियरिंग का हो या डॉक्टरी का हो उसमें अगर दादा गोपालप्रसाद व्यास जी की कविता को शामिल किया गया होता तो …. साला कोरोना भी इस देश में आने से पहले अपने मुंह पर मास्क लगाकर आता। क्या कहा? आपको मेरी बातों पर भरोसा नहीं है। यूँ भी मैं अनपढ़ लोगों से ज्यादा बहस के मूड में नहीं रहता हूँ। अकेले तो बात कर नहीं सकते मुझसे, जब देखो तब झुंड बनाकर मेरे ऊपर टिप्पणी की कोशिश करते हैं, और यही तो कोरोना चाहता है कि लोग झुंड बनाएं और उसे अपना शिकार ढूंढने में कोई दिक्कत न हो।

भले ही हम कितने भी देशभक्त हों , लेकिन अपने प्रधानमंत्री के कहने के बावजूद भी हम लोग कोरोना पीड़ित होने में ही अपनी शान समझते हैं। किसी को लगता है कि मैं तो बहुत ताकतवर हूँ तो मुझे कुछ नहीं होगा, तो कोई कहता है कि कोरोनावायरस क्या बिगाड़ लेगा। भाई! यह कोरोना कोई पहलवान तो है नहीं, एक पिद्दी सा वायरस है और पूरी दुनिया के बड़े-बड़े पहलवानों को पटक पटक के मार रहा है। और इस सबकी एक ही वजह है कि दुनिया के लोगों ने दादा गोपालप्रसाद व्यास जी की कविता को नहीं पढ़ा है। अगर उन सभी देशों के चौराहों पर इस कविता को ट्रांस्लेट कर के लगा दिया जाय तो कोरोना आत्महत्या कर लेगा, इस बात की पूरी गारंटी मैं लेता हूँ ।

मैंने इंजीनियरिंग करने बाद भी कविताओं का साथ नहीं छोड़ा था । इसलिए इस महंगाई के दौर में भी मेरी मुस्कुराहट का दाम नहीं बढ़ा है। हंसने के लिए मुझे जंगल नहीं जाना पड़ता है। जो भी कवियों के साथ रहता है उसका कल्याण होना निश्चित है। भले विकास हो न हो । क्योंकि प्रधानमंत्री जी के कहने से विकास नहीं हुआ तो क्या मेरे कहने से हो जाएगा?

वैसे मैं आपको यह भी बता देना चाहता हूँ इस फेसबुक पर कवि नहीं पाए जाते हैं। हो सकता है कविता लिखने का प्रयास करते हैं लेकिन उनकी कविता में समाज की भलाई के दर्शन नहीं होते हैं । अलबत्ता दिन में सुंदरियों के सपने देखने वाले बहुत से लोग कवि बनाने का असफल प्रयास करते हुए जरूर पाये जाते हैं । कई कवि तो इतनी आहें भरते हैं कि अगर किसी कोरोना पेशेंट के पास बैठा दिया जाय तो वेंटिलेटर की जरूरत ही नहीं पड़ेगी मरीज को । क्योंकि उनकी आहें उनका ऑक्सीज़न लेवल नीचे नहीं जाने देंगी ….भले ही बंदा मर जाय पर सीना धड़कता रहेगा ।

देश में काम धंधे की कमी तो पहले से ही है। बेकार में ही लोग सरकार के सामने अपना धरना प्रदर्शन करते हैं कि रोजगार दो । अगर इन लोगों को दादागोपाल प्रसाद व्यास की कविता अपॉइंटमेंट लैटर की जगह दी जाए तो मेरा पूरा दावा है कि इस देश के मीडिया चैनलों से बेरोजगारी शब्द और बेरोजगारों की खबर ही गायब हो जाएगी और सरकार के कुंभकर्ण नेताओं को सोने का पूरा मौका मिलेगा ।

अब आप इतने उतावले हो ही रहे हैं कि मैं बार-बार दादा गोपाल प्रसाद व्यास का नाम क्यों ले रहा हूँ , तो मैं आपको बता देना चाहता हूँ कि आराम करने से जीवन की बहुत सारी समस्याएं समाप्त हो जाती हैं। इस देश के समस्त कार्यालयों में आराम करो योजना की घोषणा की जानी चाहिए, और जो कर्मचारी सबसे अधिक आराम करें, उसे हर साल समाज और सरकार द्वारा सम्मानित किया जाना चाहिए । फिर न तो इस देश में कोई आंदोलन होगा , न फीस बढ़ाने का विरोध होगा और न ही किसानों की समस्या दिल्ली तक चलकर आएगी और न ही पुलिस को डंडे चलाने पड़ेंगे । देश का माहौल भी पूरी तरह शांत और सुखमय बना रहेगा ।

थोड़ा सब्र रखना भी सीखिये । हर चीज को पकाने में समय लगता है । मुझे भरोसा है कि अब आप उस अमोघ अस्त्र को धारण करने के लिए तैयार हो चुके हैं । लीजिये खुद ही पढ़ लीजिये , और अगर हिन्दी नहीं आती है तो किसी से पढ़वा लीजिये । लेकिन शर्त यही है कि अपनी खाट पर पड़े रहकर पढ़ना । आराम करने से आप देश की सेवा कर सकते हैं, देशभक्त और कोरोना फाइटर साबित हो सकते हैं । तो लो कर्मवीरों ! अपनी आँखों पर अपनी कमजोरी का चश्मा चढ़ाकर पढ़ लो ।

आराम करो
एक मित्र मिले, बोले, “लाला, तुम किस चक्की का खाते हो?
इस डेढ़ छँटाक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो।
क्या रक्खा है माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो।
संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो।”
हम बोले, “रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो।
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो।

आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है।
आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है।
आराम शब्द में ‘राम’ छिपा जो भव-बंधन को खोता है।
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है।
इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो।
ये जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो।

यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो।
अपने घर में बैठे-बैठे बस लंबी-लंबी बात करो।
करने-धरने में क्या रक्खा जो रक्खा बात बनाने में।
जो ओठ हिलाने में रस है, वह कभी न हाथ हिलाने में।
तुम मुझसे पूछो बतलाऊँ — है मज़ा मूर्ख कहलाने में।
जीवन-जागृति में क्या रक्खा जो रक्खा है सो जाने में।

मैं यही सोचकर पास अक्ल के, कम ही जाया करता हूँ।
जो बुद्धिमान जन होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ।
दीए जलने के पहले ही घर में आ जाया करता हूँ।
जो मिलता है, खा लेता हूँ, चुपके सो जाया करता हूँ।
मेरी गीता में लिखा हुआ — सच्चे योगी जो होते हैं,
वे कम-से-कम बारह घंटे तो बेफ़िक्री से सोते हैं।

अदवायन खिंची खाट में जो पड़ते ही आनंद आता है।
वह सात स्वर्ग, अपवर्ग, मोक्ष से भी ऊँचा उठ जाता है।
जब ‘सुख की नींद’ कढ़ा तकिया, इस सर के नीचे आता है,
तो सच कहता हूँ इस सर में, इंजन जैसा लग जाता है।
मैं मेल ट्रेन हो जाता हूँ, बुद्धि भी फक-फक करती है।
भावों का रश हो जाता है, कविता सब उमड़ी पड़ती है।

मैं औरों की तो नहीं, बात पहले अपनी ही लेता हूँ।
मैं पड़ा खाट पर बूटों को ऊँटों की उपमा देता हूँ।
मैं खटरागी हूँ मुझको तो खटिया में गीत फूटते हैं।
छत की कड़ियाँ गिनते-गिनते छंदों के बंध टूटते हैं।
मैं इसीलिए तो कहता हूँ मेरे अनुभव से काम करो।
यह खाट बिछा लो आँगन में, लेटो, बैठो, आराम करो।

शब्द मसीहा, दिल्ली

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