आस्था

सीहोर (एमपी): पांच-पांच पहलवान भी नहीं उखाड़ पाए दुर्लभ पौधे को

अटूट आस्था

मात्र चार इंच जमीन में गढ़े दुर्लभ पौधे आज तक कोई उखाड़ नहीं पाया,
धबोटी गांव में करीब 100 वर्षों से जारी पौधा उखाडऩे की रहस्यमयी प्रथा,
हर वर्ष सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु आते छोटा बारहखंबा मेले में,
पौधे के उखाडऩे के लिए पांच-पांच पहलवान नहीं कर पाते जमीन से “टस से मस”

सीहोर, एमपी मीडिया पाइंट

मध्यप्रदेश के सीहोर जिला अंतर्गत ग्राम धबोटी में दीपावली के बाद दूसरे दिन पौधा उखाडऩे की प्रथा आज भी बेहद ही रहस्यमयी है। इसके रहस्य इतिहास के गर्त में छिपे हुए है, लेकिन आज भी करीब एक दर्जन से अधिक गांवों के लोग हजारों की संख्या में इस प्रथा के साक्षी बने और यहां पर स्थित खुटियादेव के प्रति आस्था और उत्साह के साथ पूजा अर्चना करते है, लेकिन इस साल कोरोना संक्रमण काल के कारण मेले का आयोजन नहीं किया गया था, फिर भी श्रद्धालुओं पर आस्था का सैलाब उमड़ा दिखाई दिया।

इस संबंध में जानकारी देते हुए ग्राम धबोटी के उपसरपंच ईश्वर सिंह ठाकुर ने बताया कि पौधा उखाडऩे की प्रथा 100 सालों से अधिक समय से चली आ रही है, लेकिन अभीेतक कोई भी व्यक्ति इस दुर्लभ पौधे को नहीं उखाड़ सका है। उन्होंने बताया कि गांव का चौकीदार पटेल जगदीश प्रसाद के मार्गदर्शन में विशेष पूजा अर्चना के साथ ग्राम में स्थित खुटियादेव के मंदिर परिसर में पुवाडिया का दो फिट का पौधा जमीन के चार इंच के करीब गढ़ता है और उसके बाद सुबह यहां पर आने वाले श्रद्धालु खुटियादेव के दर्शन करने के पश्चात उखाडऩे का प्रयास करते है,
लेकिन यह चार इंच जमीन में गढ़ा हुआ पौधा चार-पांच लोगों के अथक प्रयास के बाद भी जमीन से टस से मस नहीं होता।
एक तरफ तो देश चांद पर जाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन ग्राम धबोटी में हर साल इस तरह की दिव्य प्रथा होती है।
अद्भूत घटना में करीब 15 हजार से अधिक श्रद्धालु हर वर्ष साक्षी के रूप में मौजूद रहते है
ग्राम के सरपंच देव सिंह और उप सरपंच ईश्वर सिंह ने बताया कि हमारे बुजुर्गों से मिली जानकारी के अनुसार दिवाली के दूसरे दिन ग्राम धबोटी में छोटा बारहखंबा के नाम से इस प्रसिद्ध मेले और पौधा उखाडऩे की इस अद्भूत प्रथा में करीब 15 हजार से अधिक श्रद्धालु हर साल साक्षी के रूप में मौजूद रहते है, लेकिन इस साल कोरोना संकट काल के कारण मेले में संख्या कम थी। जिसमें ग्राम धबोटी, धामनखेड़ा, शिकारपुर, काहरी, बामूलिया, बडनग़र, कांकडख़ेड़ा, भाऊँखेड़ी, आमझिर, मोगराराम, हसनाबाद, जहांगीरपुरा, नयापुर और आल्हदाखेड़ी आदि गांवों के बड़ी संख्या में ग्रामीण और क्षेत्रवासी श्रद्धा और विश्वास के साथ उपस्थित रहे।

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