परंपरा

परंपरा के अनुसरण मे दशहरे से पूर्णिमा तक रहेगा दुग्ध विक्रय प्रतिबंधित

आठ दिन तक सिर्फ़ घीं बनाकर किया जाता दूध का उपयोग

दशहरे से पूर्णिमा तक नहीं बिकेगा दूध…

अठवाड़े में दूध का बनाते हैं घीं, फिर कुलदेवी और देवता की पूजा एवं प्रसादी में होता हैं इसका उपयोग

(सुधीर पाठक)

मध्यप्रदेश के मालवा में गौपालक अपने पशुधन की दीपावली के दूसरे दिन पूजा करते हैं और दशहरे से पूर्णिमा तक दूध का विक्रय नहीं करते। इस दौरान जो भी दूध एकत्रित होता हैं, उसका घीं बनाया जाता हैं और फिर अपने कुल देवी और देवता की पूजा में और प्रसादी में उक्त घीं का उपयोग होता हैं। इसे स्थानीय स्तर पर अठवाड़े के रूप में संबोधित किया जाता हैं।

परंपरा का पालन करने में सनातन धर्मियों की कोई सानी नही हैं, सभी परंपराएं यहा पर पूरे रीति रिवाज और उनके नियमों का पालन करते हुए मनाई जाती हैं। मालवा में स्थानीय स्तर पर इस तरह के पर्व मनाए जाते रहे हैं, इन्ही पर्वो में अठवाड़े भी एक पर्व के रूप में मनाया जाता हैं। पशुपालक अपने पशुधन का दूध तो प्राप्त करते हैं, लेकिन उसका विक्रय नहीं करते हैं। इस प्रकार दशहरे से पूर्णिमा तक जो भी दूध एकत्रित होता हैं। उसको दही के रूप में जमाया जाता हैं और फिर उसका घीं बनाया जाता हैं। इस प्रकार अठवाड़े के दौरान जमा दूध से जो घीं प्राप्त होता हैं, उसका अपने कुल देवी और देवता की पूजा में और प्रसादी में उपयोग होता हैं।

हालाकि अनेक ग्रामों में अठवाड़े तो बैठ जाते हैं लेकिन इस परंपरा को निभाने में प्रथाओं में एकरूपता नहीं हैं। यही कारण हैं कि थोडे बहुत अंतर से यह मालवा के ग्रामों में मनाया जाता हैं। अनेक लोग इस दौरान चाय तो पीते हैं, लेकिन उसमें दूध का उपयोग नही करते हैं। तो कई लोग ऐसे भी हैं, जो इस दौरान घीं का उपयोग भी नहीं करते हैं। इस प्रकार सबकी अपनी-अपनी मान्यताएं हैं और अपने अपने रीति-रिवाज, लेकिन इन सबके बीच एक बात जो सामान्य हैं, वह हैं, दूध का विक्रय नहीं करना। इस परंपरा को गांव में कुछ लोग मानते हैं तो कुछ लोग नही भी मानते हैं। कई घर ऐसे भी हैं, जहा पर यह परंपरा मानी जाती थी, लेकिन इस दौरान घर के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाने के चलते इसका समापन हो गया। स्थानीय बोली में इसे अवटन होना कहते हैं। इसके चलते भी कई घरों में यह परंपरा बंद हो गई। लेकिन अनेक दुग्ध उत्पादक ऐसे भी हैं, जो इस परंपरा का पूरी श्रद्धा से पालन करते हैं। ऐसे लोगो की संख्या का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता हैं कि विजयादशमी के दूसरे दिन शाम से शहर की दूध डेयरियों पर भी दूध का संकट दिखाई देने लगता है, जो कुछ भी गिने चुने लोग दूध विक्रय करते हैं, उनकी क्षमता इतनी नही होती कि वे शहर की जरूरत पूरी कर सके।

इन सबके चलते नवमी को ही अनेक लोग अपने दूध विक्रेता से अधिक मात्रा में दूध प्राप्त कर लेते हैं, ताकि स्टाक बना रहे। कुलमिलाकर अठवाड़े को लेकर अनेक प्रकार की क्विदंतियां हैं, तो प्रथाए भी और इसका पालन करने वाले भी हैं और नहीं भी।

सुधीर पाठक

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