परंपरा

जहां रावण भी पूजे जाते हैं…

गिनी जाती हैं रावण की खूबियां

अकोला

संसार मे दशहरा पर्व को असत्य पर सत्य की जीत के रुप मे मनाया जाता है। अमूमन सभी नगरों-गांवों मे रावण के पुतले को बुराई का प्रतीक मानकर फूंका जाता है देश के अलग-अलग हिस्सों में दशहरा के अवसर पर रावण के पुतलों का दहन किया जश्न और आतिशबाज़ी का दौर देखते ही बनता है। लोग एकदूसरे को गले मिल बधाई देते हैं वही सोशल मीडिया पर बधाईयों का दौर एक दिन पूर्व ही शुरु हो जाता है। लेकिन महाराष्ट्र के अकोला जिले में एक गांव ऐसा भी है जहां राक्षसों के राजा रावण की पूजा की जाती है।

स्थानीय लोगों का दावा है कि पिछले 200 वर्षों से संगोला गांव में रावण की पूजा उसकी ‘विद्वता और तपस्वी गुणों के लिए की जाती है।
गांव के मध्य में काले पत्थर की रावण की लंबी प्रतिमा बनी हुई है जिसके 10 सिर और 20 हाथ हैं। स्थानीय लोग यहीं राक्षसों के राजा की पूजा करते हैं।
स्थानीय मंदिर के पुजारी हरिभाउ लखाड़े ने रविवार को ‘पीटीआई-भाषा से बातचीत में बताया कि दशहरा के अवसर पर देश के बाकी हिस्सों में बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में रावण के पुतलों का दहन किया जाता है, वहीं संगोला के निवासी रावण की पूजा उसकी ‘विद्वता और तपस्वी गुणों के लिए करते हैं।
लखाड़े ने कहा कि उनका परिवार लंबे समय से रावण की पूजा करता आया है । उन्होंने दावा किया कि लंका के राजा की वजह से ही गांव में समृद्धि और शांति बनी हुई है।
स्थानीय निवासी मुकुंद पोहरे ने कहा कि गांव के कुछ बुजुर्ग लोग रावण को ‘विद्वान बताते हैं और उनका विश्वास है कि रावण ने सीता का अपहरण ‘राजनीतिक’ कारणों से किया था और उनकी पवित्रता को बनाए रखा।
उन्होंने कहा कि गांव के लोगों का विश्वास राम में भी है और रावण में भी है। वे रावण के पुतले नहीं जलाते हैं। देश के कई हिस्सों से लोग दशहरा के मौके पर रावण की प्रतिमा को देखने यहां आते हैं और कुछ पूजा भी करते हैं।
हालांकि, इस वर्ष कोरोना महामारी की वजह से यहां भी साधारण तरीके से ही उत्सव मनाया जाएगा। एजेंसी

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