मध्यप्रदेशसियासत

एमपी मे “आइटम” बनकर रह गया चुनाव प्रचार

जनता के जहन का ज्वलंत सवाल: आखिर गद्दार कौन ?

उपचुनाव- विशेष
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राजेश शर्मा
आजादी के बाद पहला अवसर है जब मध्यप्रदेश मे होने वाले उपचुनाव “सत्ता” तय करने वाले होंगे। सत्ता का “सत्तू” खाने की ललक लिए दोनों प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं। जनता को लुभावने वादों के समुन्दर मे बार-बार डूबकी लगवाई जा रही है। विकास का नारा आकाश छू रहा है। इस उपचुनाव के दौरान आरोप-प्रत्यारोप, बयानबाजी की गलकट प्रतिस्पर्धा ने उपचुनाव को मदारी का खेल बनाकर रख दिया है। कांग्रेस-भाजपा की बयानबाजी से बेहूदगी और बेशर्मी भी मानो हार सी गई। शराफ़त का चोला ओढ़े शीर्ष नेताओं ने हिंदी शब्दावली को खुलेआम ललकारा और भूल गए कि वे जनता की अदालत मे बयानबाजी कर रहे हैं जो आगामी 03 नवम्बर को अपना फैसला सुनाकर उसे ईवीएम मे कैद करने वाली है। जिसकी घोषणा 10 नवंबर को होगी।

लोग बहुत दिनों से देखते आ रहे हैं कि प्रदेश मे मुख्यमंत्री का पद एक पका आम है अत: बहुमत वाली भाजपा के अनेक नेताओं का कुर्ते की झोली बनाकर बैठना और बगुले की तरह ध्यानस्थ हो जाना स्वभाविक है। एक जनसभा के दौरान मंच पर साक्षात दंडवत होकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान यह “आइटम” दिखा भी चुके हैं। उक्त आइटम दिखाने के बाद वह कमलनाथ के “आइटम” के खिलाफ *मौन धारण वाले “आइटम” मे घंटों तल्लीन रहे। यानि दोनों तरफ से ऐसा लगा जैसे उनके लिए उपचुनाव…उपचुनाव नहीं बचे बल्कि सियासत का एक “आइटम” हो गए।

इस मुद्दे पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने खूब “आइटम” पेश किए। सोशल मीडिया ने भी लत्ती मारने मे कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। दोनों ही पार्टी के बी ग्रेड नेताओं ने भी बयानबाजी मे अपनी जुबां को वैसे बेलगाम कर डाला जैसे घोड़ों की भीड़ मे पहुंच कुछ गधे भी चुपचाप “नाल” ठुकवाने से पीछे नहीं हटते। इनके “ढेंचू-ढेंचू” की आवाज़ सरकारी भोंपू को छोड़ कई न्यूज़ चैनलों और सोशल मीडिया पर आए दिन सुनाई देती रही।

उपचुनाव के इस पूरे दौर मे जनता को यह समझ जरुर आया कि चुनाव इसबार किसी “गद्दारी” के कारण ‘लादे’ गए हैं। गद्दारी किसी ना किसी ने जरुर की है,लेकिन गद्दारी किसने की यह समझ नहीं आ रहा। क्योंकि कमलनाथ और दिग्विजय सिंह सिंधिया को गद्दार ठहराते रहे, तो सिंधिया और शिवराज सिंह कमलनाथ को गद्दार बताते रहे। विकास की बात तो दोनों ही पार्टियों की तरफ से ऐसे हुईं जैसे वे जीतने के बाद केंद्र के “कर्जतले दबे” इस प्रदेश मे सोने की नई 28 चिड़ियाँ बनाने जा रहे हों।

हालांकि, इस उपचुनाव में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच है, लेकिन मायावती के नेतृत्व वाली बसपा और कुछ अन्य छोटे राजनीतिक दल भी मैदान में हैं। इन 28 सीटों पर 12 मंत्रियों सहित कुल 355 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। भाजपा ने उन सभी 25 लोगों को अपना प्रत्याशी बनाया है, जो कांग्रेस विधायक पद से इस्तीफा देर भाजपा मे शामिल हुए हैं। सिंधिया ब्रांड इन तमाम नेताओं का राजनीतिक भविष्य दांव पर लगा हुआ है। क्योंकि हारे तो उनकी हालत ऐसी हो जानी है जैसे__”घर के रहे न घांट के” और जीत गए तो साढ़े तीन वर्ष तक पेड़ पर चढ़ सत्ता का पौष्टिक “शहतूत” तो खाना ही है।

राजेश शर्मा

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