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बर्दाश्त करना बहादुरी नहीं “

साहित्य का सोपान

 

लेखिका- मंगला रस्तौगी


  • बर्दाश्त करना बहादुरी नहीं “

अंतर मन की पीड़ा
बयां करने में शब्दों की क्षमता
कितनी सीमित है
कोई भी शब्द उन
चीखों और सिसकियों को
बयां नहीं कर सकता
जो भीतर उठती हैं
मगर बाहर नहीं निकल पातीं
हम हमेशा इसी प्रयास में लगे रहते हैं
कि ज़िंदगी से छांट दे… अलग कर दे
अच्छे को बुरे से प्रिय को अप्रिय से..
कहानी को नाटक से
कविता को शायरी से…
पर सब एक दूसरे में फसे हुए हैं!
रोज़ उठने पर हम टटोलते हैं
इस जीवन ने हमारे सामने क्या चाल चली है
जीवन भी धीमा और तेज़ चलता है
कई बार रुक जाता है
बहुत लंबे समय तक.
अंत तो आता ही है अभी नहीं
तो कुछ सालों बाद
साथ में चलते हैं छोटे-बड़े कांप्रोमाईज़
यह सारे कांप्रोमाईज़ जैसे मांग रहे हों समय
कि बस हमें बने रहने दो
हम चिल्लाना चाहते हैं
जितना हो सके टालते रहते हैं
अनदेखा कर अन्दर के गुबार को
आ जाता है हमें टालना इस बीच
पर वह क्षणिक है
क्योंकि हमें लगता है
कि हम एक दिन जीत जांएगें
असल में हम जीतते कभी भी नहीं है
हम अपनी अंतिम हार टाल रहे होते हैं
एक पल का भावनात्मक गुबार
ही तो है आत्महत्या या के
भावनाओं के किसी तेज आवेग को
बर्दाश्त नहीं कर पाने पर उठा एक कदम
जो सभी विचारों की सीमाओं को लांघ कर
मकड़ी के जाले में अटक गए
अपने शिकार को लील जाने की
हद तक जकड़े रखता है
मत भूलो दर्द बर्दाश्त करते रहना बहादुरी नहीं बहादुरी समझदारी से मुकाबला करने में है
क्यों भूल जाते हो एक ज़िंदगी से
जुड़ी होती है कितनों की मुस्कुराहट
और खुशियां , बाट लो दर्द को
जैसे बांटते हो प्यार अपनों के साथ ।

मंगला रस्तौगी , न्यू दिल्ली, खानपुर

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