साहित्य का सोपान

फूल तुम्हारे…. खुशबू हमारी… – शैलेश तिवारी

हिंदी दिवस विशेष

फूल तुम्हारे…. खुशबू हमारी…
कहानी

बकलम- शैलेश तिवारी

जॉब से घर लौटकर…. फ्रेश होकर वह लॉन कुर्सी की पुश्त से सर टिकाए…. पलकों को बंद किए…. वह लॉन में बिखरी प्रकृति की सुंदरता को हमेशा के आंखों में कैद कर लेने की जद्दोजहद कर रही थी कि…. साइलेंट लेडी….. ने सामने की टेबिल पर लेमन टी का उसका पसंदीदा बड़ा वाला मग रख कर कहा …. दीदी चाय रखी है….। उसकी अधमुंदी पलकें खुल गई ….. और ध्यान आया नाम सायलेंट लेडी का…. अरे वही जिसे अनिल ने कभी यही नाम दिया था…. असली नाम तो शांता बाई था… लेकिन अनिल तो बस शब्दों से खेलने वाला ऐसा कुशल खिलाड़ी था कि…. शब्द उसके अधरों से या कलम से निकल कर एक नए अर्थ को पा जाते थे… ।
उसने चाय का मग उठाया.. और पहली चुस्की के साथ अनिल की यादें भी चुस्त होती चली गई.. ।
हम दम से गए , हमदम के लिए….
हमदम न मिला, हमदम की कसम…..
यही वह गाना था जिसको अनिल को पहली बार गाते हुए सुना था… बाद के कई मौकों पर उसको गाते सुना…. हर गायक की आवाज की झलक अपने गाने में शामिल कर लेने का कमाल का हुनर था उसके पास…. जितना अच्छा वह बोलता था… उतना ही अच्छा वह लिखता भी था… मुलाकातें दर मुलाकातें रीमा उसकी और आकर्षित होती जा रही थी… जब भी मिलता पूरी जिंदादिली के साथ मुस्कुराते हुए ही मिलता… पन्द्रह साल पहले उसकी जीवन साथी का शादी के दस साल बाद ही साथ छोड़ जाना भी उसके चेहरे से मुस्कुराहट को छीन न सका… इसके बाद भी उसने दूसरी शादी नही की..। मनमोहक छवि , जादुई बातें, ढेर सारे हुनर का मालिक होने के बाद भी उसने जिंदगी का सफर अकेले ही तय करना पसंद किया … लेकिन रीमा खुद उसके बारे में सोचती रहती … इतने शानदार व्यक्तित्व को किसी ने तो प्रपोज किया ही होगा… । रीमा और अनिल के बीच मिलने पर, फोन पर , व्हाट्सएप पर खूब बातें होने लगी थी लेकिन यह पूछने की हिम्मत कभी न जुटा पाई….।
जुटाती भी कैसे…. कहीं अनिल इसका कोई और मतलब न निकाल ले… वह भी तो अपनी अपाहिज माँ के साथ बिन व्याही ही रह रही थी.. पिता जल्दी चल बसे तो दो छोटी बहनों और अपाहिज माँ की जिम्मेदारी निभाने में…. शादी का ख्याल भी रोड़ा सा लगता था… अब दोनों छोटी बहने अपनी अपनी ससुराल में खुशनुमा जीवन जी रही हैं… और वह माँ की सेवा और नोकरी के बाद बचे समय को मासिक किटी पार्टी और अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में लगाती रही….। ऐसे ही एक कार्यक्रम में अनिल गाता हुआ मिला था…. और वह जैसे जैसे उसके बारे में जानती गई… अपने आप बिन डोर में बंधे उसकी तरफ खिंचती जा रही थी….।
चाय का आखिरी घूंट लेकर … उसने टेबिल पर रखे मोबाइल को उठाया …. नेट ऑन किया .. व्हाट्सएप पर अनिल को सर्च किया … और शुभ संध्या का संदेश भेज दिया….।
वह भी ऑन लाइन ही था.. तुरंत रिप्लाई आ गया..। रीमा ने लिखा … मैं आपसे कुछ पूछना चाहती हूँ… अनिल का जवाब .. हाँजी , पूछिए..।
…. लिखकर नहीं… आमने सामने बैठकर…। आप कब फ्री हैं…। रीमा ने कहा… अभी भी फ्री ही बैठा हूँ.. सचिन देव बर्मन के गाया गाना…. मेरे साजन हैं उस पार… मैं मन मार हूँ इस पार…. सुन रहा हूँ..।अनिल का जवाब था…।
“पंद्रह मिनट बाद किलोल पार्क में मिल सकते हो…” यह टाइप करते करते जैसे रीमा ने एक निर्णय सा ले लिया…।
“चलिए मैं वहां पहुंच रहा हूँ…” रिप्लाई आते ही उसका नेट ऑफ हो गया।
किलोल पार्क रीमा के घर से पांच मिनट की दूरी पर ही था… उसने अपनी एक्टिवा निकालते हुए शांता बाई को आवाज लगाई…. “मैं एक काम से जा रही हूँ.. आधे पौन घंटे में लौट आऊँगी… माँ को बता देना…।”
एक्टिवा स्टार्ट की और रास्ते में पड़ने वाले बुके सेंटर से एक छोटा सा बुके खरीदा और दस मिनट में ही किलोल पार्क में प्रवेश कर लिया। खुले बाल… नीली साड़ी… फिरोजी बुंदकी वाली…. कोहनी के नीचे तक का ब्लाउज … और साड़ी से मैच करती… कलाई भर चूड़ियां… उम्र के ढलान पर खड़ी रीमा एक दम नील परी सी उतर आई थी किलोल पार्क के उस कोने वाली बेंच पर…. हाथ में पकड़ा पीले फूलों वाला गुलदस्ता उसने बेंच के नीचे इस तरह से रख दिया…. कि आते ही अनिल की नजर उस पर न पड़े… । पांच मिनट का इंतजार भी आज कुछ लंबा सा लग रहा था… बार बार खड़ा हो कर … गेट की तरफ देखना और बैठ जाना… उसकी बेसब्री बयां कर रहा था…। अनिल से जो कहना है… उसका क्रम भी मन ही मन दोहरा रही थी…। सोलह मिनट गुजर चुके थे… तभी अनिल ने वहां अपनी चिर परिचित मुस्कान के साथ एंट्री ली… गहरी नीली जीन्स पर पीले रंग का कुर्ता उस पर खूब जँच रहा था… रीमा उसकी इन परम्परागत ड्रेस कोड से भी खासी प्रभावित थी…उसने आते ही दोनों हाथ नमस्कार की मुद्रा में जोड़े और कहा भी… रीमा ने भी दोनों हाथ जोड़ें और तेजी से उसकी तरफ बढ़ी.. लगा कि उसके दोनों हाथ अपने हाथों में थाम ले.. लेकिन ऐसा कर न सकी…. बेंच पर आकर दोनों बैठ गए…।
“कहिए… ऐसी क्या बात है…. जो यहां बुलाया… घर बैठकर क्या बात नहीं हो पाती….।”
रीमा के दिल की धड़कनें शताब्दी ट्रैन के पहियों से निकलने वाली आवाज से स्पर्धा कर रही थी…. सूखते कंठ को थूक निगलकर तर करते हुए वह बोली .. ” देखिए … आप मेरी बात को अन्यथा न लीजिएगा… ।”
कुछ रुककर उसकी बड़ी बड़ी आंखें अनिल के चेहरे पर गड गई.. उसके चेहरे पर आ रहे भावों को पढ़ने के लिए…। मंद स्मित… अनिल ने कहा … ” कहिए तो सही..।”
” उम्मीद है आप मेरी बात का सही सही उत्तर देंगे… और बुरा भी न मानेंगे….।” रीमा ने कहा
” पहेलियाँ न बुझाओ… कुछ कहोगी तभी न उत्तर दे पाऊँगा..।” इस बार अनिल की आवाज में गंभीरता थी।
” आप इस उम्र में भी इतने चुस्त दुरुस्त हैं…. भगवान की कृपा से .. गाते भी बहुत अच्छा हैं… दिल को छू लेने वाला लिखते भी हैं… मंत्र मुग्ध करने वाला बोलते हैं…. और सबसे बड़ी बात आप बिना तनाव के हमेशा मुस्कुराते रहते हैं….। ”
” ये वह सवाल तो नहीं…. जिनका उत्तर मैं दूँ..।” अनिल ने सवालिया अंदाज में रीमा को बीच में ही टोक दिया….।
” अरे…. पूरी बात तो सुनिए… तभी न सवाल सामने आएगा..।” इस बार रीमा खुद को काफी सहज महसूस कर रही थी… ।
” असल सवाल यह है कि… आपको कभी किसी महिला ने आकर्षित नहीं किया…।”
हाहाहा……. जोरदार हँसी के साथ अनिल रीमा की बड़ी बड़ी झील सी आंखों में झांकने लगा… जैसे तलाश कर रहा हो… उन में तैरती किसी शंकुतला दुष्यंत के प्रेम की कश्ती को…. । फिर बोला … ” मेरे दिल की घंटी तो एक ही बार बजी…. तो साथ पढ़ने वाली पत्नी बन गई… उसके जाने के बाद भी अहसास यही रहता है… पल पल दिल के पास.. वो रहती है…. तो कभी किसी शरीर धारी की इच्छा न रही..।”
” लेकिन किसी ने .. कभी तो प्रपोज किया ही होगा..।” इस बार रीमा ने पूरे आत्मविश्वास से कहा..।
” अभी तक तो नहीं…।” शांत स्वर में अनिल बोला। तभी रीमा झुकी बेंच के उस कोने की तरफ… और साथ लाया गुलदस्ता उठाया …. और खड़े होकर अनिल की तरफ बढ़ा दिया….। अनिल ने भी खड़े होकर उसको होले से छुआ… और कहा…. ” फूल तुम्हारे… खुशबू हमारी….।” .. और पलट कर चल दिया….।

शैलेश तिवारी, सीहोर
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समीक्षा

मुकेश दुबे

समी फूल तुम्हारे…. ख़ुशबू हमारी
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जब आज के वातायन के दरवाज़े को हौले से थपकी देकर बीता कल छम्म से कूदता है अन्दर, कल की शांत लहरें तरंगित हो हलचल सी मचा देती हैं और आज में कल गड्डमड्ड होता प्रतीत होता है।
इस तरह की शुरुआत कहानी के कथ्य की उस बात को अनावृत करता है जिसमें गुजरी ज़िंदगी है, ज़िंदगी का हासिल ख़ुशी या दर्द… और बहुत कुछ अनकहा होता है जो कानों में सरगोशी करता रहता है अपने मौन से।
फूल तुम्हारे, ख़ुशबू हमारी भी ऐसी ही दास्तान है जिसमें रीमा और अनिल पात्र हैं लेकिन ऐसा लगता है पुराने परिचित हैं।
यहाँ हम थोड़ी सी चर्चा कथ्य पर कर लें जिससे आगे की बात में आसानी रहे।
अनिल… खूबसूरत, मिलनसार, सलीकापसन्द प्रौढ़ जिसमें युवावस्था अभी भी ठहरी हुई है अधगुजरी शाम की तरह।
सहपाठी से प्रेमविवाह के बाद जुदाई का दंश झेलता तन्हा इंसान जिसने अपने चारों तरफ़ के खालीपन को भरने की कोशिश की है अपनी कुछ आदतों व व्यवहार से।
रीमा… पिता के अचानक, असमय गुजरने के बाद अपाहिज माँ और दो छोटी बहनों की जिम्मेदारी अपने काँधों पर उठाये समय से पहले परिपक्वता के भंवर में फंसी युवती।
बहनों के विवाह के बाद जब कुछ जिम्मेदारियों से मुक्त हुई, माँ की देखरेख और अपनी नौकरी के साथ समाज और सोशल मीडिया में चैन तलाशने लगी।
यहाँ ऐसे ही कहीं वो अनिल से मिली थी। सिर्फ़ मिली नहीं, मिल कर जुड़ने लगी भावनात्मक रूप से।
लाज़मी भी है यह। सूखी नदियाँ बड़ी तेजी से सहेजती हैं जल और एकांत रास्ते लालायित रहते हैं पदचाप सुनने के लिए।
अनिल के लेखन व गायन के सम्मोहन में रीमा के मन-मस्तिष्क में अगर कुछ स्वप्न चहलकदमी करने लगे हैं तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है।
यहाँ लेखक ने बिना शब्दों के एक बात और कह दी है।
तरुणाई में विपरीत लिंग के बीच, आकर्षण हो सकता है, उतावलापन में प्यार का इज़हार भी हो सकता है लेकिन उम्र के जिस पड़ाव पर कहानी के नायक-नायिका हैं, बस ठहराव और एक-दूसरे का सहारा बन जीवन के निर्वात में थोड़ी प्राणवायु भरना ही लक्ष्य होता है। दैहिक आवश्यकता गौण हो जाती है।
यहाँ पर उल्लेखनीय है लेखक का दृष्टिकोण। कहना है बहुत कुछ मगर बिना कुछ कहे… एक श्यामल बदली नभ पर छाये और पावस ऋतु का भान हो जाए, कोई तारा टूटे और हाथ दुआ में उठ जाये… लहरों के शोर की भाषा समन्दर को समझ आ जाये।
रीमा के अंतर्मन में अनेक प्रश्न घुमड़ते रहते हैं लेकिन अनुत्तरित।
जब साइलेंट लेडी, (शांता बाई को अनिल का नवाजा टाइटल) रीमा के लिए मनपसंद लैमन टी लाकर रखती है, उसकी महक के साथ चला आया अनिल का ख़याल।
गर्म घूँट और नींबू का खट्टा, कड़वा स्वाद आज मीठा लगा जब किसी की यादों से हिचक नहीं हुई। हमेशा सशंकित व सकुचाया रहने वाले मन में एक विचार कौंधा और मोबाइल बन गया कबूतर जो प्रेम संदेशों के आदान प्रदान के लिए विख्यात है।
यहाँ एक और बात जो प्रभावित करती है वो है मिलने का स्थान चयन, वस्त्र और एक पीले फूलों का गुलदस्ता।
घर पर भी मुलाकात हो सकती थी लेकिन शायद उस माहौल मे वो बात न हो जो करना है।
नीले और पीले रंग का संयोजन व शब्दों की जगह फूल जो अपने रंग व ख़ुशबू से वो भी कह देते हैं जिसको होंठ और जुबान नहीं कह पाती।
किलोल पार्क में चंद शब्दों में हुई बात और इशारों में जाहिर होते जज्बात…. जिस तरह से कहानी का समापन किया गया है, इससे बेहतर कुछ और नहीं हो सकता था।
न प्रत्यक्ष रूप से रीमा ने कुछ कहा न अनिल ने बस उसका खड़े होकर हौले से छूना और कहना… फूल तुम्हारे… ख़ुशबू हमारी जैसे कह गया, रजनीगंधा फूल तुम्हारे, महकें मेरे जीवन में……
एक सुखांत, कहानी के समापन पर एक रिश्ते की शुरुआत…. वाकई महक उठा जीवन।
लाजवाब कहानी। बधाई शैलेश भाई।
-मुकेश दुबे

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