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आज है भगवान महावीर का “जन्म कल्याणक”

— आचार्य श्री मुक्तिप्रभ सूरिजी

जैन धर्म के 24 तीर्थंकर में प्रथम तीर्थंकर का नाम ऋषभदेव था अंतिम तीर्थंकर का नाम महावीर स्वामी था जैन जगत में 45 आगम ग्रंथों को धर्मशास्त्र के रूप में महत्वपूर्ण मान्यता दी गई है। उनमें कल्पसूत्र नामक जो महान ग्रंथ है, उसमें भगवान महावीर को तीन नामों से प्रस्तुत किया गया है।

सर्वप्रथम वर्धमान कुमार

आमल की क्रीडा के बाद महावी

एवं देव कृत उपसर्गों में अपराजित बनने के बाद देवों द्वारा दिया हुआ तीसरा नाम था श्रमण भगवंत
श्री महावीर स्वामी

जैन ग्रंथों में लिखा गया है कि कोई भी तीर्थंकर का मातृ कुक्षी मैं जब अवतरण होता है तब भी वे आत्माएं

मति ज्ञान
श्रुतज्ञान
अवधी ज्ञान
यह तीन महान ज्ञान की धारक होती है।

तीर्थंकर भगवान का जीवन अद्भुत एवं अलौकिक होता है। तीर्थंकरों के जीवन की पांच महत्वपूर्ण घटनाओं को पंचकल्याणक के नाम से जाना जाता है। प्रभु महावीर की आत्मा का मातृ को कुक्षी में अवतरणं हुआ उस घटना को भगवान महावीर का च्यवन कल्याणक कहा गया जोकि आषाढ़ शुक्ल सष्टि के दिन हुआ था ।भगवान महावीर का मातृ कुक्षी से जन्म चैत्र शुक्ल त्रयोदशी की मध्यरात्रि में हुआ जिसको भगवान महावीर का जन्म कल्याणक कहा गया।भगवान महावीर ने कार्तिक वद दशमी को दीक्षा ग्रहण की उसको भगवान महावीर का दीक्षा कल्याणक कहा गया।भगवान महावीर को केवल्य ज्ञान की प्राप्ति वैशाख सुदी दसवीं को हुई।उसको भगवान महावीर का केवल ज्ञान कल्याणक कहा गया और भगवान महावीर को मोक्ष की प्राप्ति आशोवदी अमावस्या को हुई उसे भगवान महावीर का निर्वाण कल्याणक कहा गया।

आज के दिन का सबसे बड़ा महत्व यह है कि आज झारखंड स्थित क्षत्रिय कुंड नगर में मध्य रात्रि को शुभ समय पर आकाश में जब सभी ग्रह उच्च स्थान में थे तब सिद्धार्थ महाराजा के महल में त्रिशला महारानी की कुक्षी से भगवान महावीर का जन्म हुआ था सचमुच कहा जाए तो आज महावीर की जन्म जयंती नहीं है अपितु भगवान महावीर का जन्म कल्याणक है ।

जनसमाज में जिनका जीवन महत्वपूर्ण होता है जो देशभक्त हो, समाज को कोई नई दिशा दिखाकर कांति पूर्ण जीवन जीने वाले हो ऐसे व्यक्ति के जन्मदिन एवं स्वर्ग दिन जन्म जयंती या स्वर्ग जयंती का नाम देना व्यवहार पूर्ण बात है। लेकिन जो राग द्वेष से पूर्ण रहित बन चुके हैं, वितराग और सर्वज्ञ सर्वदर्शन है ,ऐसे भगवान महावीर के जन्मदिन को जन्म जयंती का नाम देना यह तो भगवान का अवमूल्यन है ।
भगवान महावीर के जन्मदिन को जन्म कल्याणक के रूप में ही ,मनाना चाहिए।
भगवान का जन्म होते ही उर्धलोक एवं अधो लोकवासी 56 दिशिकुमारी देवियों ने आकर रात्रि में ही प्रभु का सूती कर्म किया। सूती कर्म पूरा होते ही देवलोक से 64 देवेंद्रो ने आकर माता को अवस्वापिनी निद्रा देकर जन्मजात भगवान को पंच रूप कर के हाथों में ले लिया और स्वर्ण में मेरु पर्वत के शिखर पर प्रभु का ठाट बाट से सभी देव देवियों ने मिलकर जन्माभिषेक किया और प्रभु को वापस त्रिशला माता के पास रख कर अपना देवीय कर्तव्य हृदय के भावों के साथ पूर्ण किया। जब भगवान का माता की कुक्षी में अवतरण हुआ था तब से सिद्धार्थ महाराजा के महल में धनधान्य -हिरा- मानिक- मोती- पन्ना आदि सभी मूल्यवान वस्तुओं की वृष्टि होने लगी वह वृष्टि के अनुरूप ही माता पिता ने पुत्र का नाम वर्धमान कुमार रखा । बचपन से ही भगवान तीन ज्ञान से युक्त होने से महा ज्ञानी थे फिर भी अपने प्रभु के ज्ञान से अनभिज्ञ माता पिता ने वर्धमान कुमार को पढ़ाने के लिए पाठशाला ले गए, उसी समय देवलोक में स्वधरणेंद्र का सिंहासन चलायमान हुआ शीघ्र गति से नीचे आकर उन्होंने पढ़ाने वाले पंडित के मन में कई सालों से जो प्रश्न थे उसका निराकरण वर्धमान कुमार के द्वारा करवाया ।भगवान की आत्मा जन्म से ही संसार से विरक्त होती है। फिर भी ज्ञान से अपने अपूर्ण कर्म को जानकर पूर्ण करने के लिए माता पिता के आग्रह से और अनासक्ति भाव से पाणिग्रहण भी करते हैं। वर्धमान कुमार और यशोदा के जीवन बाग में एक फूल खिला जिसका नाम था प्रियदर्शना। वर्धमान कुमार के बड़े भाई नंदी वर्धन के नाम से सुप्रसिद्ध थे। भगवान महावीर का दीक्षा जीवन बहुत ही कष्टमय था। जहां तक ज्ञान में केवल की ज्योत प्रकट ना हो वहां तक नीचे बैठना नहीं ,कहीं सोना किसी के साथ बोलना नहीं, एवं खड़े-खड़े ही ध्यान मे रहना यह उनकी प्रतिज्ञा थी। साढे बारह साल की साधना के बाद उनको केवल ज्ञान हुआ वह वितराग सर्वज्ञ एवं सर्वदर्शी बने। केवल ज्ञान के बाद देवों ने नीचे आकर समवशरण के नाम से व्यासपीठ की रचना की शमवशरण के 3 गढ़ होते हैं।
प्रथम रजतमय
द्वितीय स्वर्णमय
और तृतीय रत्नमय समवशरण का विस्तार एक योजन का है। भगवान के प्रभाव से करोड़ों देव – देवी एवं मानव समूह एवं पशु – पक्षी गंण प्रभु की देशना सुनने को समवशरण में आकर बैठते हैं। प्रभु की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि भगवान बोलते हैं अर्ध मागधी भाषा में लेकिन सुनने वाले सभी को अपनी अपनी भाषा में वांणी समझ में आती है। पशु-पक्षी भी अपनी भाषा में वांणी को सुनते हैं। भगवान ने अपने शासन में जाति ज्ञति का कोई भेद नहीं रखा था ।उन्होंने सर्वज्ञ बनने के बाद में शासन स्थापना के समय सर्वप्रथम 11 ब्राह्मणों को दीक्षा दी थी जो उनके 11 गंणधर कहलाते थे। उन्होंने सर्वप्रथम चंदना नाम की एक राजकुमारी को दीक्षा दी थी ।वह उनके शासन की प्रथम साध्वी के रूप में स्थापित हुई। धर्म करने का एवं मोक्ष पाने का अधिकार पुरुष एवं स्त्री दोनों को समान रूप से है यह भाव भगवान ने स्पष्ट शब्दों में प्रतिपादित किया ।सर्वज्ञ बनने के बाद भगवान महावीर को जहां तक मोक्ष नहीं हुआ वहां तक 30 साल में एक भी दिन ऐसा नहीं था जिस दिन भगवान ने कम से कम 6 घंटे की देशना नहीं दी हो ।भगवान ने आम जनता को जो उपदेश दिया था वह उपदेश था। अहिंसा का पालन करो असत्य को छोड़ो और अचोर्य को अपनाओ। परिग्रह का त्याग करो अपरिग्रह को आदर्श बना कर अल्प परिग्रह में संतोष मानो भगवान महावीर सिर्फ जैन कौम के नहीं है । लेकिन भौम के हैं। भगवान महावीर ने सम्मेतशिखर तीर्थ के पास ऋजूवालिका नदी के तट पर गोदोहिका आसन में केवल्य की ज्योत प्रकट की थी ।और पावापुरी तीर्थ में 48 घंटे की अंतिम देशना देकर आशोज अमावस्या को मुक्ति पाई थी। पूरे विश्व में जहां एक भी जैन का घर होगा वहां आज प्रभु महावीर के जन्म की खुशियां मनाई जाएंगी। अनंत वंदनीय
विश्व वंदनीय चरम तीर्थपति भगवान श्री महावीर स्वामी के चरणों में।🙏

विशेष – बकलम संपादक जयंत शाह

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