साहित्य का सोपान

क्या मन पढा जा सका…

क्या मन पढा जा सका…

क्या कभी बुद्धि से, मन पढ़ा जा सका?
बुद्धि दे रोक फिर, कब बढ़ा जा सका?

प्रेम तो है सदा, ही हृदय में बसा,
छल कपट ने मगर, प्रेम को जब डसा।
बुद्धि कहने लगी, अब न विश्वास कर,
है छलावा, नहीं मोह पर आस कर।

शक भरा फिर कहांँ, ये गढ़ा जा सका?
क्या कभी बुद्धि से, मन पढ़ा जा सका?

प्रेम के गीत जो गुनगुनाऊँ कभी,
नाम तेरे करूंँ, गीत मैं वो सभी।
रोक लेना मुझे, रूठ जाऊंँ अगर,
हांँ समझना विवश, जो न आऊंँ अगर।

प्रेम सोपान क्या, यूंँ चढ़ा जा सका?
क्या कभी बुद्धि से, मन पढ़ा जा सका?

मन कहे प्रेम राधा कभी श्याम है,
बुद्धि तो कह रही, प्रेम बदनाम है।
दोष ही दोष है, बस भरी वासना,
पर कहे मन कि है प्रेम आराधना।

प्रेम पर दोष फिर, कब मढ़ा जा सका?
क्या कभी बुद्धि से, मन पढ़ा जा सका?

कुलदीप कौर “दीप”
गुरुग्राम हरियाणा

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