साहित्य का सोपान

हार…..

हार

मैं तो हूँ हारती नहीं कभी भी
दुर्गम हो राहें चाहे भी कितनी।

राधा से सीखा कठिन प्रेम है
मीरा से सीखा विष को पीना।
त्याग का ज्ञान मिला सीता से
भरत राम से जीवन यह जीना।
कंटकों के भी दीवार मिले बहु
रही तोड़ती मिलीं वह जितनी।

चट्टानों को तोड़कर जब मानव
एकाकी ही पथ निर्माण करे है।
सीखा उससे साहस की सीमा
कितनों के ही दुख देख हरे है।
मैं तो हूँ हारती नहीं कभी भी
दुर्गम हो राहें चाहे भी कितनी।

स्वाभिमान पहचान बिन्दु रख
जमकर हर कदम बढ़ाती जाती।
झुके न सके मम शीश कभी यह
ऐसों को हूँ सबक पढ़ाती जाती।
खुद के हो साथ कोई समझौता
नीति तोड़ती नित ही मैं उतनी।

डाॅ सरला सिंह “स्निग्धा”
दिल्ली

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