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“शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले वतन पर मर मिटने वालों का यही बाकी निशा होगा “

वतन पर जो फिदा होगा, अमर वो नौजव‍ां होगा

मकर संक्रांति 14 जनवरी प्रतिवर्ष सीहोर सेकडा खेड़ी मार्ग स्थित शहीद समाधि स्थल पर सीहोर जिले के जनप्रतिनिधि, जिला प्रशासन के प्रमुख अधिकारी, सभी प्रमुख पत्रकार गण , राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधि, गणमान्य नागरिक एवं जागरूक युवा पीढ़ी के लोगों सहित नगर के आमजन एवं छात्र छात्राएं शहीद हुतआत्माओं को अपनी विनम्र पुष्पांजलि अर्पित करने के लिए एकत्रित होते हैं।

 

मालवा के “जलियांवाला बाग ” के नाम से से पहचाने जाने वाला यह शहीद समाधि स्थल ऐतिहासिक दृष्टि से इस लिए भी महत्वपूर्ण है कि इतनी बड़ी संख्या 356 लोगों के एक साथ शहीद होने कि यह घटना शायद ही कहीं हुई हो।

देवेंद्र ओसरे

तत्कालीन सिद्धपुर सीहोर में 14 जनवरी 1858 को 356 क्रांतिकारियों ने दी थी शहादत

ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ 1857 की क्रांति को भारतीय इतिहास में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में देखा जाता है। मेरठा से 10 मई 1857 को सैनिक विद्रोह के रूप में शुरू हुई इस क्रांति ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका। ब्रिटिश शासन के खिलाफ लोगों में असंतोष फैलता गया और धीरे-धीरे इस आन्दोलन ने उग्र रूप ले लिया। पूरे देश के साथ ही मध्य भारत में भी अंग्रेजी हुकूमत ने इस विद्रोह को दबाने के लिए अनेक क्रांतिकारियों को गोली से भून दिया।

अंग्रेजी शासन के खिलाफ मध्य भारत में चल रहे विद्रोह में सीहोर की बर्बरतापूर्ण घटना को “जलियांवालाबाग” हत्याकांड की तरह माना जाता है।  दस मई 1857 को मेरठ की क्रांति से पहले ही सीहोर में क्रांति की ज्वाला सुलग गईं थी। मेवाड़, उत्तर भारत से होती हुई क्रांतिकारी चपातियां 13 जून 1857 को सीहोर और ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंच गयी थी। एक अगस्त 1857 को छावनी के सैनिकों को नए कारतूस दिए गए। इन कारतूसों में सूअर और गाय की चर्बी लगी हुई थी। जांच में सुअर और गाय की चर्बी के उपयोग की बात सामने आने पर सैनिकों में आक्रोश और बढ़ गया। सीहोर छावनी के सैनिकों ने सीहोर कॉन्टिनेंट पर लगा अंग्रेजों का झंडा उतार कर जला दिया और महावीर कोठ और वलीशाह के संयुक्त नेतृत्व में स्वतंत्र सिपाही बहादुर सरकार का ऐलान किया। अंग्रेजी हुकूमत के सबसे क्रूर जनरल ह्यूरोज ( जिसका जिक्र कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी कविता में किया है और इतने में हियुरोज आ गया फसी हाय अब महारानी थी ।)को जब सीहोर की क्रांतिकारी गतिविधियों के बारे में जानकारी मिली तो उन्होंने इसे बलपूर्वक कुचलने के आदेश दिए। सीहोर में जनरल ह्यूरोज के आदेश पर 14 जनवरी 1858 को सभी 356 क्रांतिकारियों को जेल से निकालकर सीवन नदी किनारे सैकड़ाखेड़ी चांदमारी मैदान में लाया गया। इन सभी क्रांतिकारियों को एक साथ गोलियों से भून दिया गया था। जनरल ह्यूरोज इन क्रांतिकारियों के शव पेड़ों पर लटकाने के आदेश दिए और शवों को पेड़ों पर लटकाकर छोड़ दिया गया था। दो दिन बाद आसपास के ग्रामवासियों ने इन क्रांतिकारियों के शवों को पेड़ से उतारकर इसी मैदान में दफनाया था। मकर संक्रांति के अवसर पर 14 जनवरी को बड़ी संख्या में नागरिक सैकड़ाखेड़ी मार्ग पर स्थित शहीदों के समाधि स्थल पहुंचकर पुष्पांजलि अर्पित करते हैं।
सीहोर के लोगों का यह मानना है कि इतनी बड़ी क्रांतिकारी घटना को कहीं ना कहीं इतिहास में वह स्थान नहीं मिल पाया जो मिलना था।
परंतु बसंत उत्सव समिति एवं उससे जुड़े सदस्यों द्वारा लगातार प्रयास करके शासन एवं नागरिकों के सहयोग से समाधि स्थल को विकसित कर एवं प्रतिवर्ष आयोजन हुतआत्माओं को श्रद्धांजलि देकर स्मरण किया जाता है।

सिद्धपुर (सीहोर) के बाशिंदे इस एतिहासिक आयोजन के लिए धन्यवाद के पात्र हैं

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