साहित्य का सोपान

ग्रामीण औरतें

 

वो
इमामदस्ता में
खरड़ के नीचे डालतीं रहती हैं
पसीने में सने
अपने मन के सारे क्लेश
और मूसली से कुचल कुचल कर
उन्हें चकनाचूर कर देती हैं

वो
रात के घुप्प अँधेरों में
बिजली से चौंधियाते
अपने संताप को
भर लेती हैं अपने अँचरे में
और तड़के उठते ही उन्हें
ला पटकती हैं सिलबट्टे पर
और चटनी की तरह उन्हें
बारीक लुग्दी सा पीस देती हैं

वो
बुहार लेती हैं
पास पड़ोस के तानों से पड़े
दिमाग़ के दड़बे में
मकड़ी के से जाले
और अपने अहाते में पसरे
सभी जाल जंजाल भी
फिर डाल देती हैं इन्हें
चक्की के दोनों पाटों के बीच
और धान की भूसी सा
उन्हें कुचल देती हैं

वो
भोर में ही नहा धोकर
गोबर माटी से लीप देती हैं रसोई
फिर घर गृहस्थी के
सभी बखेड़े को बीन कर
उपलों व लकड़ी के संग
माटी के चूल्हे में पूर देती हैं
फिर उसे दियासलाई लगा कर
अपने मन के कच्चे से भावों को
कच्चे दूध के पतीले में उड़ेल
पकने को रख देती हैं

वो
अपने चित्त में हिलोरे मारती
सारी की सारी कामनाओं को
तुलसी मैय्या के गाछ के संग
भरपूर स्नेह का
खातर पानी डालकर
बिरवे में साथिया कर के
रोप देती हैं

वो
नेह की बहती जलधारा में
भीगे गेरू से
भीत पर खींच देतीं हैं
आड़ी-तिरछी रेखाएँ
जिससे झांकते हैं
राम सिया
तीज त्योहार डोली कहार
हाथी घोड़ा तोता मैना
पिया मिलन
और ना जाने वो चाव ही चाव में
क्या क्या रच देती हैं

वो
प्रीत के सुई डोरे से
अपने घाघरे ओढ़नी में
बेलबूटे टाँकतीं हैं
परदों में फुनगी
और तकिए में उमंगों संग
बाग बगीचे की फुलवारी
काढ़ देती हैं

वो
गाँव देहात की
जुझारू सुघड़ औरतें
कुछ इसी तरह से
बचाये रखती हैं
अपना प्रेम
अपने रिश्ते
अपने सपने
अपने संस्कार
और अपना घर संसार

लीना खेरिया
अहमदाबाद, गुजरात

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