साहित्य का सोपान

समंदर जैसी यादें

समंदर जैसी यादें

तन्हाई साथ रहना तुझ पे एतबार है
कहना नहीं किसी से तू ही राजदार है
वक़्त की लकीरें छूकर मुझे गुज़र गई
हाथों से मेरे यूँ तक़दीर फिसल गई
ज़िंदगी नाराज़ सी…
कुछ हताश लगी मुझे,
जैसे तूफानों में…
कश्ती कोई निकल गई,
एक दरिया जिसका छोर नहीं था
ख़ामोश था बहुत…
शोर नहीं था…
थक चुका था वक़्त के थपेड़ों से शायद
लहरों में कोई ज़ोर नहीं था,
अब कश्ती थम सी गई थी
बीच दरिया में…
जम सी गई थी,
कोई थपेड़ा हिला भी न पाए
कुछ ऐसी आदत…
बन सी गई थी,
ज़िंदगी ने बहुत सिखाया
हँसकर कह सकतीं हैं अब आँखें
इन लकीरों की तालीम…
अब पढ़ सकती हैं साँसें,
आज़ाद है अब उड़ जाने को
सितारों से करने को बातें,
वक़्त की लकीरें छूकर गुज़रीं हैं
समंदर जैसी छोड़ के यादें…

शिल्पी अग्रवाल, सुल्तानपुर, उप्र

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