साहित्य का सोपान

गम जो खुशी दे गया….

गम जो खुशी दे गया

मीना ने टेबिल पर रखी आखिरी फ़ाइल को हाथ में उठाया और चाय के प्याले से घूंट भरती हुई उसको पढ़ने लगी। फ़ाइल की फलेगिंग करते हुए आखिर में नोट शीट बनाकर अटैच की और उसके चेहरे पर विजयी मुस्कान तैर गई। बॉस के चेम्बर में फ़ाइल को प्यून के हाथ भिजवाते ही उसने जल्दी जल्दी अपनी ड्रावर को लॉक करते हुए घड़ी पर नजर डाली तो चार बजने की घोषणा होने ही वाली थी। उसके कदम तेजी से ऑफिस के बाहर की तरफ चल दिये। बॉस से घर जल्दी जाने की परमिशन मिल ही चुकी थी तो पांव जमीं पर कम पड़ रहे थे हवा में उड़ते हुए उठ रहे थे। आज बस से जाने के बजाए उसने टेक्सी पकड़ी थी।
कितनी खुश थी वो आज … उसकी देवरानी मधु की गोद भराई की रस्म में शामिल होने के लिए ही तो जल्दी छुट्टी ली थी। अचानक उसकी विचार सरिता का प्रवाह मानों किसी चट्टान से टकरा कर शोर करने लगा। सबके सामने हंसती मुस्कुराती अपने काम में व्यस्त मानों ऐसे कुछ भी दर्द उसके सीने में न हो । चेहरे पर मुस्कुराहट की लहर हमेशा छायी रहती थी पर आंखें झूठ नहीं बोलती ……इस बात का एहसास मीना को हर पल रहता था कि समाज न जाने कितना कुछ छीन लेता है एक स्त्री से उसका जब वो बाँझ होने का दर्द झेलती है । कुदरत की कमी जब एक स्त्री की कमी बन जाती है तो वह अभिशप्त सा जीवन जीने को मजबूर हो जाती है। जब किसी को मौका मिलता वह अपने शब्दों इन मीना को इस बात का अहसास करा ही देता। इन सभी के बीच उसे राहत देती थी देवरानी मधु…. जो इसमें मीना की नहीं कुदरत का दोष देखती।
मधु के तसल्ली देने वाले रवैये की याद आते ही ख्यालों ने करवट ले ली।
घर में खुशी की लहर थी , मधु की मां बनने की खुशी , हर तरफ चर्चा का विषय थी । आज उसी चर्चा को मुकाम मिलने जा रहा था। मधु के मायके से सभी आकर मधु की गोद भराई की रस्म अदा करने वाले थे। तभी टेक्सी के ब्रेक लगे और हिचकोले खाते हुए टेक्सी घर के सामने रुक गई। उसने टेक्सी वाले को पेमेंट किया और अपना केरी बेग सभालते हुए उतर गई।
घर के हाल में प्रवेश करते ही हाल के बींचो बीच सजाया गया छोटा सा पालना देखा। पालने में ढेर सारे खिलौने को करीने से उसके चारों और लटकाया गया था। इस पल की मानों उसे सदियों से प्रतीक्षा थी। वह खुद को रोक ना पायी । पास में गई और पालने को छू कर ही वह उस अहसास को जी लेना चाहती थी जिसके लिए गुजिश्ता वक्त में बहुत तड़पी थी…. जल बिन मछली की तरह।
तभी वहां मधु की मां आयी और सबके सामने उसे बांझ कह कर पालने को छूने से मना कर दिया। मीना पर जैसे वज्रपात हुआ। वह अपनी जगह जड़वत खड़ी रह गई। न उसके शरीर में कोई प्रतिक्रिया हुई न ही मुंह से कोई बोल फूटे। बस आंखें अपना काम करती रही। यह बात उसकी देवरानी मधु से बर्दाश्त ना हुई और उसने सबके सामने अपनी ही मां को खूब खरी-खोटी सुनाई ।
मधु के सब ससुराल वाले खड़े…. चुपचाप बस मीना की बेबसी को देखते… तो कभी मधु के बेबाकी को सुनते रहे । मधु ने अपनी मां को कहां “मेरी गोद भराई की पहली रस्म मीना भाभी ही करेंगी ”
“उनका बाँझ होना यह उनका दोष नहीं है ।यह कुदरत का दोष है । ”
“विज्ञान इतनी तरक्की कर चुका है कि अब यह दोष दोष नहीं रह गया ” ….और सामाजिक व्यवस्थाएं भी ऐसी चली आ रही हैं कि इस दोष को दूर करने में मदद करती हैं।’
मधु के गर्भ में जुड़वा बच्चे होने की बात परिवार के सभी सदस्य जानते थे । मधु ने कानूनी तौर पर अपनी एक संतान को अपनी भाभी की गोद में देने का एलान सभी के सामने कर दिया। यह मीना के लिए और अपने परिवार के लिए सबसे बड़ा उपहार था।
मधु के इस फैसले से मीना की आंखों से मानो सालों पुराना दर्द बह निकला हो और हजारों रंगीन सपने उसकी आंखों में सजने लगे हो ।
“ममता कब रुक पाती है छलकने से ”
मीना ने मधु का हाथ पकड़ा और चुपचाप उसे देखती रही ।
बस मीना के मुंह से कुछ चंद शब्द निकल पड़े… मैं बांझ नहीं हूं मैं भी मां हूं ..
सबके चेहरे पर खुशी और आंखों में नमी दे गए ।

मोनिका ‘मिश्री’
बैंगलूरू, कर्नाटक

समीक्षा

ज़िन्दगी में गम तो बहुत होते ही हैं…. लेकिन कुछ गम ऐसे भी होते हैं …. जिनके बारे में वैज्ञानिक सोच आने के बाद …. और उसकी हकीकत जान लेने के बाद भी… समाज उस गम को समय असमय कुरेदता ही रहता है… ऐसा ही गम है किसी स्त्री का बांझ होना…। तिल तिल कर … जीते जी … हर पल मृत्यु तुल्य कष्ट सहने जैसे होते हैं…. इसे लेकर कहे जाने वाले साधारण और व्यंग्य वाक्य….। इसी दर्द के साये में जी रही थी कहानी की नायिका मीना… हर क्षण , हर पल….. कोई न कोई उसको …. उसके बांझ होने का अहसास कराता रहा… फिर भी वह ऊपर से सही…. लेकिन मुस्कुरा कर जीने की कोशिश करती रही…. मां नही बन पाने का घाव नासूर बन गया…. जिसका दर्द हर कभी रिसकर उसकी आंखें भिगोता रहा…. वह घरेलू के अलावा कामकाजी महिला की श्रेणी में थी…. उसके दर्द को समझती थी उसकी देवरानी…. मधु…। जो नायिका के लिए बहुत बड़ी राहत थी….। तभी एक खुशखबरी ने उनके घर के आंगन में कदम रखा… मधु के माँ बनने की चिकित्सकीय घोषणा के साथ…. फिर आई वह घड़ी जब मायके वाले मधु की गोद भरने आए… बस इसी रस्म को लेखिका ने केंद्र में रखकर उन तमाम महिलाओं के दर्द का हिमालय खड़ा कर दिया जो कुदरत की टेडी नजर की वजह से मां नहीं बन पाती…. और कदम कदम पर इस दोष से होने वाले अपमान का कड़वा घूंट पीती हुई जिंदगी जीती हैं.. लेकिन यहां नायिका के पास उसकी देवरानी मधु के रूप में एक देवी मौजूद है…. जो अपनी सभावित जुडवा संतान में से एक को नायिका मीना की गोद में सौंपने की घोषणा कर अपने परिवार की खुशियों को न केवल दोगुना कर देती है…. बल्कि मीना को यशोदा बन जाने का सुख भी प्रदान कर देती है….। कहानी सुखांत है तो सूखकर हो जाती है…. लेकिन इतना जरूर कह जाती है कि आज के वैज्ञानिक युग में भी बांझपन को नारी की कमी न समझा जाए…. बल्कि इसे प्रकृति की भूल माना जाए…। सरलता के साथ समाज के कठिनतम विषय को कथानक का केंद्र बना लेना… इस का उजला पक्ष है…। बधाई मोनिका जी…।

शैलेश तिवारी, सम्पादक

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