साहित्य का सोपान

समझ गई मैं….

समझ गई मैं।

अधिक लगाव किसी से
एहमियत कम कर देता है।
सोचती थी, क्या यह बात सत्य होती है?
जिंदगी ने धीरे धीरे यह सच
समझाया मुझको।
कोई किसी का नहीं है आज,
यह बतलाया मुझको।
सब झूठ फरेब के रिश्ते,
सबसे पहले जाते,
जो बनते बहुत हैं अपने।
खाली खाली,सूना मन,
स्वयं का साथी बन जाता।
गोद में लेकर टूटे मन को,
स्वयं ही है सहलाता।
हाथ उठकर आंसू पोंछकर,
मूंह कान में कुछ कह जाता।
मन कहता बस मैं तेरा हूं,
क्यूं स्वयं को एकान्त में पाता।
किस्से तू रखता उम्मीद,
किस्से वफ़ा है चाहता।
ये कलियुग का इन्सान,
पाठ वफ़ा का ना आता।
पीठ पर वार,नीच विचार,
मित्र,मीत,ना भाई बंधु,
धोखा करना, दर्द देना,
आंख का आंसू यह बन जाता।
ईश्वर पर विश्वास रखो बस,
ना कोई रिश्ता ना नाता।
विश्वास करो तो पछताओ बस,
फिर स्वयं , स्वयं को सहलाता।
दोष किसी का नहीं फिर होता,
जब मित्र बन दुश्मन ठग जाता।
सांप को पिलाकर दूध रखो,
परन्तु क्या डसना उसे तजना आता।

कौशल बंधना पंजाबी
नंगल डेम, पंजाब

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