साहित्य का सोपान

#अनपढ़

#अनपढ़
अपना कालखंड समाप्त कर प्रो. व्यंजना अपने कमरे में आ रही थी तभी कॉरीडोर मेंं उसे शांतनु आता दिखा।
शांतनु, हिन्दी का प्रोफेसर। सुशील व शालीन, बोलने का लहजा सुसभ्य व दूसरे को सम्मानित करता हुआ। यह अलग बात है व्यंजना से सामना होते ही नजरें झुक जाती हैं उसकी।
ये नजरों का झुकना ही व्यंजना को उद्वेलित कर जाता है और वो कोई मौका नहीं छोड़ती शांतनु से बात करने का।
पास आते ही उसने हाथ जोड़कर नमस्कार शांतनु जी कहा तो वो बेचारा सकपकाया हुआ सा बस हाथ जोड़ सका। उसकी दृष्टि अभी भी नीचे थी जैसे फर्श पर कुछ तलाश रही हों।
व्यंजना ने पूछा “कहाँ जा रहे हैं?”
“जी वो पुस्तकालय में कुछ पुस्तकें निकालने का कहा था। वहीं जा रहा था देखने, शायद निकाल दी हों।”
मुझे भी जाना है लाइब्रेरी, यह रजिस्टर रख दूँ फिर साथ चलेंगे। आइये।
कमरे में पहुँचकर बोली बैठिए, बस चलते हैं। शांतनु कुर्सी पर बैठ गया। व्यंजना ने चपरासी को चाय लाने का कह दिया।
चाय पीकर चलते हैं।
शांतनु टेबल पर रखे पेपरवेट को घुमा रहा था, व्यंजना उसे देख रही थी और आनंदित भी हो रही थी। कौन कहेगा यह व्यक्ति पीएच. डी. है वो भी बीएचयू जैसे नामी विश्वविद्यालय से। बच्चों सा भोलापन दिखता है इसके चेहरे पर।
आपके रहने की व्यवस्था हुई या नहीं। व्यंजना ने पूछा।
शांतनु ने एक बार निगाह ऊपर उठाई और फिर पेपरवेट देखते हुए बोला “जी वो मिल गया है कमरा। पास ही है कॉलेज के और सभी सुविधाएँ हैं।”
“मतलब फर्निश्ड है।”
“नहीं! मतलब खुली छत है। शौचालय व स्नानगृह पृथक हैं। सबसे बड़ी बात बस एक ही कमरा है ऊपर तो किसी तरह का व्यवधान करने वाला कोई नहीं है।”
“चलिए यह बहुत अच्छा हुआ। खाना बाहर ही खाते होंगे आप।”
“हमको बाहर का खाना नहीं जमता। समय बहुत है तो स्वयं ही बना लेते हैं।”
चपरासी ने दो प्याले चाय रख दी। लीजिए सर! चाय लीजिए। व्यंजना ने कहा।
अब आपने बुला ही ली, मैं सुबह के अलावा चाय नहीं पीता।
अरे…. मुझे मालूम होता तो नहीं बुलाती। अब आ ही गई है तो पी लीजिए।
शांतनु कप उठाकर चाय के घूँट भरने लगा।
व्यंजना कनखियों से उसे ही देख रही थी।
चाय खत्म होते ही वो खड़ा हो गया। मैं पुस्तकालय हो आऊँ।
अरे हाँ… आप लाइब्रेरी जाने की बात कर रहे थे। जाना तो मुझे भी है लेकिन अब मेरा कालखण्ड है।
***
व्यंजना को मजा आता था शांतनु को छेड़ने में। उसका लड़कियों की तरह शर्माना और बेचैनी बहुत अच्छी लगती थी उसको।
तीन दिन की लगातार छुट्टी थी कॉलेज की। पता नही क्यों व्यंजना के मन में खलिश सी थी,
दूसरे दिन। उसने मसाला भर कर करेले बनाये थे। गाजर का हलवा भी रखा है। दोनों चीजें टिफिन में रखकर वो अपनी ज्यूपीटर से शांतनु के घर के लिए निकली।
नीचे मकान-मालिक रहते हैं। व्यंजना ऊपर आई तो शांतनु कपड़े धो रहा था। वो पैजामा और बनियान पहने था। व्यंजना को अचानक देख घबरा गया। जल्दी से एक बुशर्ट पहनी और बोला “आप यहाँ.. कोई काम था क्या….”
“काम तो नहीं बस इस तरफ़ आई थी तो सोचा आपसे मिलती चलूँ।”
“आइये बैठिए। यहाँ आ जाइये।” कहते हुए शांतनु ने एक पर रखी दूसरी कुर्सी को अलग किया और कुछ फासले से रख दिया।
व्यंजना ने पूरे कमरे का एक नज़र में अवलोकन कर लिया। दो टेबल जोड़ कर गैस स्टेंड बना लिया है। दीवार में एक रैक है जिसमें कुछ डिब्बे रखे हैं। एक पलंग और दो कुर्सी। एक स्टील की अलमारी और रेफ्रिजरेटर। बस यही है शांतनु की गृहस्थी। पर्याप्त भी है अकेले आदमी के लिये। कमरा एक है लेकिन किचन, बेडरू, लिविंग रूम सभी हैं।
व्यंजना ने पर्स से टिफिन निकाल कर टेबल पर रखे और बोली, आपके लिए सब्जी और गाजर का हलवा लाई हूँ।
आप नाहक ही परेशान हुईं। मुझे आदत है खाना बनाने की।
कैसी परेशानी… मेरे लिए तो बनता है। उसमें से ही ले आई आपके लिये।
शांतनु ने फ्रिज से दूध निकाला और चाय बनाई।
बहुत बढ़िया चाय बनाता है वो। हर चीज बिल्कुल नपी तुली थी चाय में।
चाय के साथ ढेर सारी बातें चलती रहीं दोनों में। घर में कौन-कौन है, खाना बनाना कब सीख लिया जैसी हल्की-फुल्की बातों से लेकर पसंद व फ्यूचर प्लान तक जा पहुँची बात।
अब शांतनु सहज लग रहा है और निगाहें मिलने पर नीचे नहीं देख रहा है।
“अब मैं चलूँ शांतनु जी। छुट्टी में आप आ जाया करिये कभी। ज्यादा दूर नहीं है घर यहाँ से।”
“जी अवश्य, जब मौका मिला मैं आऊँगा।”
शांतनु उसे नीचे तक छोड़कर गया।
***
व्यंजना इतना तो समझ गई थी कि दिल्लगी से शुरू हुआ यह सिलसिला दिल की लगी तक आ पहुँचा है।
एक दिन भी अगर शांतनु नहीं मिले तो मन अजीब सा होने लगता है।
एक शर्मीली मुस्कान के साथ मनोहारी चेहरा अब आँखों में बस गया है।
लेकिन उस अनपढ़ को कोई कैसे समझाए। भावों को तो वो पढ़ ही नहीं सकता। अनपढ़ ही था वो व्यंजना के लिये।
जरूरी नहीं स्त्री हर बात शब्दों में ही कहे। बहुत सी बातें आँखों और भंगिमाओं से भी कह दी जाती हैं। प्रोफेसर साहब तो कुछ समझते नहीं।
कहीं ऐसा तो नहीं येड़ा बनकर पेड़ा खा रहा है। लेकिन कहीं से भी ऐसा लगता तो नहीं।
लगता है खुद ही मंगलसूत्र और सिंदूर लेकर जाना होगा कि
“हे नाथ! मेरी माँग में सिंदूर भरकर गले में यह मंगलसूत्र बाँध दीजिए। अब हम दांपत्य सूत्र में बँध गये हैं।”
कई बार वो बातों-बातों में प्रेम या विवाह का प्रसंग लाती लेकिन शांतनु बड़ी चतुराई से विषय बदल देता था।
स्टाफ़ में बाजपेयी जी की बेटी की शादी है। सभी लोग जायेंगे। व्यंजना ने शांतनु से पूछा वो क्या उपहार लेकर जा रहा है।
शांतनु ने कहा वो बड़ा परेशान है यही सोचकर। पहली बार ऐसा मौका आया है। आप ही बताइये क्या देना ठीक रहेगा।
आप कितने तक का उपहार देने का सोच रहे हैं?
हमने कहा न इस मामले में हम बिलकुल अनाड़ी हैं। आप ही कुछ सोचिए वही हम ले लेंगे। नहीं हम न ले पायेंगे, उसमें भी आपको मदद करनी होगी।
अरे तो इसमें क्या हुआ। मैं अपने लिए गिफ्ट लेने जाऊँगी ही। ऐसा करते हैं दोनों साथ चलते हैं।
जी जैसा आप कहें।
तो कल चलकर जो भी देना है वो ले लेते हैं। परसों ही तो शादी है।
यही ठीक रहेगा। शांतनु ने कहा। अगले दिन वो दोनों पहले गये शो-पीस देखे। कोई पसन्द नहीं आया। फिर क्राकरी में भी यही हुआ। व्यंजना ने कहा ‘यह सब ऐसा सामान है जिसे गिफ्ट में ही दे दिया जाता है।’
‘हम भी वही सोच रहे हैं कि कोई ऐसी चीज हो जो उपयोगी हो।’
‘टाइटन की हमसफ़र रेंज में घड़ियों पर आफर चल रहा है। हम दोनों मिलकर अगर वो दें तो कैसा रहे। एक दुल्हन व एक दूल्हे की घड़ी रहेगी।’
लीजिए…. नेकी और पूछ-पूछ। कम से कम उपयोग में तो आयेगी। वही ले लेते हैं।
दोनों टाइटन के शोरूम में आये और घड़ी का एक सैट दोनों को पसन्द आया।
सेल्स मेन ने पूछा आप लोग यहीं पहनेंगे या पैक कर दूँ?
गिफ्ट पैक करवा दीजिये। व्यंजना ने कहा।
मैम नाम क्या लिखना है बता दीजिए।
‘शांतनु’ और ‘व्यंजना’ लिखवा दें।
सेल्स मेन डिब्बा पैक करवा कर लाया। व्यंजना ने देखा। उस पर लिखा था मि.& मिसेज शांतनु~व्यंजना।
जोर से हँसी वो। उसे हँसता देख शांतनु देखने लगा डिब्बा और बोला ‘पहले आप का नाम होना चाहिए।’
अब और जोर से हँस पड़ी व्यंजना। हँसी रुकी तो सोचने लगी, तुम सचमुच अनपढ़ हो शांतनु। बोली देखो तो क्या लिखा है। मि. & मिसेज कर दिया है।
शांतनु ने अब वो डब्बा ध्यान से देखा। पढ़कर वो भी हँस दिया।
व्यंजना ने सेल्समेन से कहा, सिर्फ़ शांतनु और व्यंजना लिखने का कहा था। इसको ठीक करवा दें।
जी मैम। अभी दूसरा स्टिकर बनवा देता हूँ।
शांतनु बोला यह ऐसा ही रहने दें। एक अलग से पैक कर उस पर नाम ठीक कर दें।
क्या यह भी ले रहे हो? व्यंजना ने पूछा।
“व्यंजना जी एक बात कहें अगर आप अन्यथा न लें।”
“मैं बिल्कुल अन्यथा नहीं लूँगी कहिये आप क्या बात है।”
“जो गलती से लिखा है वो शायद तकदीर का फ़ैसला है। हमारी जोड़ी भी ईश्वर ने बनाकर भेजी है। हम चाहते हैं एक घड़ी उपहार स्वरूप आपको दें।”
“अरे वाह अनपढ़!! भावनाएँ भले न पढ़ीं लेकिन गलती से लिखे हुए को बिल्कुल सही पढ़ा है।”
***
©मुकेश दुबे

समीक्षा

दिल की किताब…. पढ़ने का हुनर … नीली छतरी वाला पढ़े लिखों को भी नहीं देता …. इसी उक्ति को कहानी के आरंभिक दौर में सिद्ध होता भी बताया…. लेकिन अंत भला सो सब भला…. प्रेम की सैद्धांतिक अवस्थाओं में से एक… मिलन से ही यह प्रसंग शुरू हुआ…. मजे की बात है कि न स्तब्ध हुए… न कम्पन … न रोम हर्षे…. न स्वर भंग हुआ….. बस बात दिल्लगी से प्रारंभ हुई …. और एकतरफा होकर… दिल की लगी तक जा पहुंची।
तीन दिन की कॉलेज की छुट्टियों ने… टिफिन घर पहुंचा दिया…. और प्रोफेसर साहब की झिझक भी टूटी…. अंत में टायटन घड़ी ने …. प्रेम को उसकी परिणीति स्वीकारोक्ति तक पहुंचा दिया…. और दोनों ने बारह बजे की सुंईयों की तरह मिलने का निर्णय ले लिया….।
अधूरे प्रेम को शब्द देने वाली कलम ने पूर्ण प्रेम को शरद के पूर्ण चंद्र की तरह चित्रित कर दिया… यह कमाल भी किसी कमाल से कम तो नहीं….।
कांपते होंठ और झुकती निगाहों वाले प्रेम से कुछ अलग… ऐसी प्रेम कथा रचना जो न केवल सुखद हो बल्कि हर पंक्ति के बाद जिज्ञासा बढ़ाती जाती हो… और पाठक होहि है वही जो मुकेश भाई की कलम रची राखा के भाव से पढ़ता जाता हो…. अंत में हृदय को स्पर्श करने के साथ ही समापन होता हो कथानक का…. एक तसल्ली सी पाकर पाठक वाह करः उठता है… वह भी तब जब एक शिक्षक गलती को सही मान लेता है…। बधाई भाई…।

शैलेश तिवारी, सम्पादक

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