साहित्य का सोपान

मन करता है मेरा

मन करता है मेरा
———————
छोड़ के सारे झाम झमेले
निकल पड़ूँ मै कहीं अकेले
बच्चों जैसी फिर बन जाऊँ
माँ के आँचल में छुप जाऊँ
मन करता है ।

परियों से लूँ पंख उधार
तितली से लूँ रंग हज़ार
पंखो से लूँ धरा को नाप
जुगनू का मै पहनूँ ताज
मन करता है ।

उजली चंदा सी बन जाऊँ
तारों पे मैं हुक्म चलाऊँ
अंतरिक्ष में धूम मचाऊँ
ग्रहों से मनका भाग्य लिखाऊँ
मन करता है

कहाँ फँस गयी इस झंझट में
आटे- नौन के इस चक्कर में
भोलेपन ने दौड़ लगा दी
नानी हमको याद दिला दी
कैसे इसको वापस पाऊँ

गम्भीरता का फेंक लबादा
लालच हमसे गया न त्यागा
कच्ची इमली कच्चा आम
नमक-मिर्च संग खूब चबाऊँ
मन करता है

छीना जिसने मेरा बचपन
इस जवानी को सबक़ सिखाऊँ
मन का बच्चा कहाँ खो दिया
ढूँढ के ला दो इसे बताऊँ
मन करता है

बस मन करता है ।

डॉक्टर लक्ष्मी कुशवाह, हाल मुकाम उमरिया, मप्र

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!
Close