साहित्य का सोपान

गांव बनाम शहर….

गांव बनाम शहर….

हम गांव वाले लोग…. बचपन से शुद्ध गांव वाले हैं तो गांव वालों के मन की मनःस्थिति को शिद्दत से समझा है…बचपन से ही एक हीनभाव मन में घर बना लिया कि हम गांव वाले हैं… शहर(बम्बईया, दिल्ली, कलकत्ता) तब हम इन्हीं तीन नामों को ही शहर जानते थे.. इन शहरों के रहे, पढ़ें बच्चे रंगबिरंगे कपड़ों में गांव आते थे और खड़ी भाषा में बात करते थे और हम गांव वाले बच्चों को हीन दृष्टि से देखते थे तो मन में हीनभाव अपने आप ही आ जाता था… कि हम गांव में क्यों रहते हैं ?? फिर हमें मन करता था कि हम लोग भी इसी तरह रंग बिरंगे कपड़े पहने और किसी से ना बतायें कि हम गांव में रहते हैं…। गांव में ही पढ़ाई-लिखाई किये… तेज तर्रार थे तो पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं हुई, हर जगह सेट होते गये।
फिर भी मन में गांव के लिए हीनभाव और शहर में रहने की ललक कम ना हुई।

जैसे-जैसे बडे़ हुए तो एक नयी सनक मन में घर कर गई कि क्या हुआ जो गाँव में पैदा हुए। शादी तो किसी शहरी बाबू से ही करेंगे तब तो मुझे कोई गांव वाला नहीं कहेगा ना … पर…. किस्मत का रंग ऐसा कि शादी तो गांव में हुई ही… हमने अपना बिजनेस सेटअप भी गांव में ही बनाया… क्योंकि शहर में हमारे जैसे लाखो थे वहां हमें कोई पूछता तक नहीं… तो जहाँ कोई प्रतिद्वंद्वी ना हो वहां से शुरुआत करने का सोचा… किस्मत ने साथ दिया और सब अच्छा चलने लगा … जैसे-जैसे जिन्दगी सेट हुई तो…घूमना फिरना शुरू किया…जैसे कि सब करते हैं हम भी लाखों खर्च करने लगे घूमने-फिरने पर।

तब आंख खुली और गांव जाकर फिर ना जाने कितनी बार अपने खूबसूरत से गांव को बडे़ ही प्यार से निहारा और सोचा कि जहां हम घूमने-फिरने जाते हैं वहां हमारे गांव से खूबसूरत क्या है??? हम तो कितनी किस्मत वाले हैं कि हम गांव वाले हैं….दूर दूर तक फैली हरियाली… खुला आसमान… आसपास खूबसूरत दिल के लोग… जरा सा बीमार हो जाओ तो दस लोग पूछने सेवा करने आ जाते हैं।

जिन गांव के लोगों को शहर वाले लोग गाली में भी गंवार कहते हैं वही तो सबकी रोटी-दाल चलाते हैं…क्योंकि आप शहर वाले पैसे कमाते हो पर पैसा थोड़ी खाओगे… खाओगे तो गांव का अनाज ही ना।

शहर वाले गांव छोड़ गये और शहर में ले लिया एक फ्लैट…. जहां उस फ्लैट के बाहर का आदमी ना आपको जानता है और ही ना पूछता है और आप कहते हो कि हम शहर वाले हैं…. तुम्हारे घर आये दो मेहमान को जितनी रोटी खिलाने में तुमको कष्ट होता है, उसकी पांच गुना रोटी हम गऊ माता, कुत्ते और अन्य जानवरों को खिला देते हैं।

तकलीफ ये नहीं कि तुम शहर वालों ने हम गांव वालों को हीनभाव से देखा…. सबसे बड़ी तकलीफ ये है कि सरकार ने भी कभी हमें इज्जत नहीं दी… शहर के लिए चौबीस घंटे बिजली… गांव के लिए आठ घंटे… शहर के लिए चौड़ी सीमेंट की सडकें गांव के लिए ईंट का खड़ंजा… शहर के लिए केन्द्रीय विद्यालय गांव के लिए प्राइमरी स्कूल…शहर के लिए बड़ी बड़ी बाजारें गांव में एक दुकान के लिए शहर का मुंह ताकना।

आज भी खेतीबाड़ी करने वाले लोगों को आप इज्जत की निगाह से नहीं देखते हो। अगर गांव में रहने वाले पचास बीघे के काश्तकार से पूछो कि आप क्या करते हो तो वो बडे़ ही असमंजस से बताता है कि कुछ नहीं।
सबका पेट भरने वाला अन्नदाता बडे़ ही असमंजस से बताता है कि हम कुछ नहीं करते।

सलमान खान अपने खेतो में ट्रैक्टर चलायें तो खबरें दिनभर टीवी पर आती हैं और सालों से खेतों में हल चलाने वाला गंवार कुछ नही करता।

गलती सबकी है… हमारी है…. आपकी है…. आप अपना पांच बिसवा में बना घर छोड़कर हजार स्क्वायर फिट वाले फ्लैट में आकर चौड़े हो रहे हो… और गांव अपनी किस्मत पर कराह रहा है कि क्या गलती हो गई हमसे… हमने तो भर भर कर तुमको रहने की जगह… खाने को अनाज और घूमने को खुला मैदान दिया था फिर तुमने शहर को क्यों चुना…. लौट आओ अब…. मेरी बांहे आज भी बांछे फैलाये तुम्हारा इंतजार कर रही हैं… मत बिखरने दो मुझे… साल के बारह महीने के लिए नहीं तो कम से कम बारह दिन के लिए ही चले आओ…. पर चले आओ।

घर आजा परदेशी तेरा गांव बुलाये रे…..

गांव की ही एक पढ़ी-लिखी गंवार आप सबकी…..

“पूनम राजपूत” गौरीगंज, अमेठी, उप्र

समीक्षा

भारत की आत्मा गांव में बसती है….. महात्मा गांधी का यह वाक्य उस समय सत्य था…, परंतु वक्त की चाल से बदली दशा और दिशा ने आज….. खासकर कोविड 19 काल के दौरान और बाद भी…. यह साबित कर दिया की भारत की आत्मा ही नहीं अर्थ व्यवस्था की रीढ़ भी गांव ही हैं…. याद कीजिये उन दिनों को जब कोरोना काल में पूरे देश की अर्थ व्यवस्था से जुड़ा हर सेक्टर… माइनस योगदान जीडीपी में दे रहा था….., अकेला गांव का कृषि क्षेत्र जीडीपी को प्लस में रहकर सम्भाले हुए था…।
इसके बावजूद गांव की तरफ हमारी सरकारों का ध्यान उतना नहीं गया…., जितना शहरी क्षेत्र और ओद्योगिक विकास को तवज्जो दी गई…., लेखिका पूनम जी का असल दर्द तो यही है…., जो उन्होंने अपने गांव बनाम शहर आलेख में रेखांकित किया है…. इसका गवाह वह किसान आंदोलन भी है जिसकी आज 26 नवम्बर को वर्षगांठ मनाई जा रही है… आखिरकार क्या वजह रही कि… इस आंदोलन को दुनिया के सबसे लंबे समय तक चलने वाले किसान आंदोलन में तब्दील होना पड़ा…. खैर आलेख के बहाने बीमार होने पर पड़ोसी के दुःख में सभी ग्रामीणों का शरीक होना… उस अंग्रेज लेखक के मुंह पर भी तमाचा है…. जिसने अपनी एक किताब में भारतीयों की अनेक विशेषताओं का उल्लेख करते हुए यह कहा था कि…. भारतीयों को आसपड़ोस में तांक झांक करने में बड़ा मजा आता है….. बिजनेस का सेट अप शहर की जगह गांव में बिना प्रतिस्पर्धा के आसानी से तरक्की की राह पकड़ लेता है…. यह भी शाश्वत सत्य है लेकिन व्यवहार में नहीं…..। ग्रामीण जन को शहरी बाबू द्वारा हीनभाव से देखना… आज भी बदस्तूर जारी है… यह हमारी मानसिकता का ओछापन दर्शाता है… वसुधैव कुटुम्बकम का नारा बुलंद करने वाले देश के लोग… अपने ही देश के ग्रामीणों को हिकारत भरी नजर से देंखे तो… पूनम राजपूत की कलम की स्याही का दर्द भरे अल्फाजो में उभर आना लाजिमी है….। सबकुछ मिलाजुलाकर जोड़ यह कि…. गांव आज भी उस हक के मोहताज हैं …. जिस पर गांव का जन्म सिद्ध अधिकार होना चाहिए…. तभी तो लेखिका अंत में पुकार उठती है उन तमाम थ्री पीस सूट धारियों को जो जुड़े गांव की मिट्टी से हैं… लेकिन उन्हें हवा शहर की लग गई है…. घर आजा परदेशी…. तेरा गांव बुलाये रे… यह पंक्ति अपील है… देश की सम्पूर्ण आबादी से… जो गांव की मेहनत से ही… अपनी ग्लैमर भरी जिंदगी जी पा रहे हैं…. या उनके पितृ कभी न कभी गांव से ही रहे हैं….।

शैलेश तिवारी, सम्पादक

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