साहित्य का सोपान

सुनो स्वीटी….

सुनो स्वीटी…..

“सुनो स्वीटी! एक बार फिर से अपने बाल बॉय कट करवा लो न प्लीज। ”
“अरे यह क्या कह रहे हो? अब शादी के तीस वर्ष बाद फिर से बॉय कट।”
“स्वीटी संबोधन …. हो क्या गया है तुम्हे? बहू का भी नाम स्वीटी है उसके बाद से तुम ने कभी इस नाम से नही पुकारा था।”

“सब बच्चे क्या कहेंगे अगर अब बाल कट कराए तो।”
” तुम्हारे ही कहने से दसवीं क्लास के बाद से बाल बढ़ाने चालू किये थे तुम को पसंद नही थे, आज फिर से क्यों छोटे करने को कह रहे।”
प्रिया अपने आकाश के मुख से यह सुन के अचरज में पड़ गई थी तभी एक साँस में इतना सब बोल गई।

“अरे- अरे साँस तो ले लो कितना बोलती हो, आज भी बिना बहस कोई बात नही मानती हो मेरी।”
“पसंद थे तब भी वह तो मैं देखना चाहता था कि तुम थोड़ा बड़े बालों में कितनी कयामत लगती हो तभी कहा था यार।”__ आकाश ने समझाने की कोशिश की।

” अब हम दोनों ही है घर मे,बच्चे तो छुट्टियों में ही आते तो क्यों न अपनी बूढ़ी लेकिन खूबसूरत प्रिया के साथ शुरुआती दिनों को फिर से जियूँ।”

यह सब सुन के प्रिया पुराने दिनों में खो गई।

वह दसवीं में थी और आकाश चार वर्ष बड़े थे। आकाश की छवि पूरे मोहल्ले में बहुत ही समझदार और पढ़ने वाले लड़के की थी। आकाश ने प्रेम का प्रस्ताव रखा तो प्रिया को एक सपने जैसा ही लगा उसकी खुशी का ठिकाना ही नही रहा वह झट से मान गई।
दो वर्ष ही साथ रह पाये फिर आकाश आगे की पढ़ाई ,और बाद में नौकरी के कारण बाहर चले गए।
साल में एक या दो बार आते कुछ दिनों के लिए, तब मिलना भी बहुत मुश्किल होता। काश मोबाइल का जमाना होता तब कितनी आसानी रहती।
प्रपोज करने के कुछ दिनों बाद मौका पाते ही आकाश ने बड़े प्यार से गले लगाते हुए चुपके से कान में कहा था, अब बाल मत कटवाना और लड़कियों जैसे रहा करो हर समय पैंट ही पहनती हो।
कितनी सुंदर हो तुम , तुमको पता नही है।
उस दिन क्या क्या महसूस हुआ था वह बता नही सकती रोम रोम खिल गया था यह सब सुन कर।

” सुनो प्रिया! परसों हमें गोआ जाना है तुम पैकिंग कर लेना
उसी होटल में बुकिंग है जहाँ हनीमून में थी।”
इतना कह के आकाश जल्दी से निकल गए बाहर शायद उनको भी शर्म सी आ रही थी।
अच्छा जी एक के बाद एक सरप्राइज अब मैं दिखाउंगी इनको, वह मन ही मन सोच रही थी वही पिंक नेलपॉलिश लगा के वैसी ही जाली दार शॉल ओढ़ के उसी पेड़ के नीचे ले जायेगी। यह सब सोच कर ही चेहरे पर मुस्कान छा गई और प्रिया बाल कटवाने चल पड़ी।

शालिनी दीक्षित, जुबैल, सऊदी अरब

समीक्षा

उम्र दराज दाम्पत्य जीवन…. जब बच्चे अपने अपने कैरियर को संवारते हुए… अपने अपने कामों से दूर देश या शहर में मशगूल….. उस नाजुक से वक्त में समय बिताना… शायद कुछ यादों के साथ… उदासियाँ और बोरियत…. पैदा कर देता है….। संभवतः इसी सम्भावना की कल्पना कहें…. या किसी उम्र की ढलान उतर रहे दम्पत्ति की हकीकत.. जो भी हो…. इसी बिंदु को लेकर ताना बाना बुना गया कथानक ….. सुनो स्वीटी … का…। कहानी में बुजुर्ग दम्पत्ति के जीवन की बोरियत को न कहा गया है न दर्शाया गया है…. उसके उलट केवल और केवल…. चौथेपन के दाम्पत्य जीवन में उत्साह उमंग और गुजिस्ता वक्त को जी लेने की तरकीब का खुलासा किया है…..। इसके पीछे छिपी बोरियत और उदासी अपने आप बयां हो जाती है…. यही खासियत है कथानक की…।
कथानक पर गौर करें तो… बुजुर्ग पति आकाश… अपनी पत्नी प्रिया से बॉब कट…. बाल कटवाने का प्रस्ताव रखता है… यहीं से दोनों में हल्की फुल्की बहस होती है….. और इसी बहस के दौरान लेखिका ने खूबसूरती के साथ…. फ्लैश फिक्शन का इस्तेमाल करते हुए….. दम्पत्ति के किशोर वय के प्रेम का इजहार करा दिया….. फिर पति की पढाई के दौरान… आई दूरी….. लौटने पर बनी नजदीकियाँ …. कान में फुसफुसाते हुए… बॉब कट बाल बढ़ाने की बात कह दी जाती है…. और अब बढ़े हुए बाल फिर कटवाने की इल्तज़ा….. अहा… कौन सा पाठक न बौरा जाए… इस सिचुएशन को पढ़कर…। और कहानी का वर्तमान में प्रवेश…. गोआ की उसी होटल के उसी कमरे की बुकिंग… जहां मधुचंद्र… गुजरा…. और चल पड़ती है.. आकाश की प्रिया… स्वीटी बनकर …. बाल कटाने….। कहानी यूँ तो साधारण दिखती है… लेकिन उम्रदराज जीवन के जीने की शैली…. सिखाते ही असाधारण बन जाती है….। शालिनी जी बहुत बहुत बधाई…. ।

शैलेश तिवारी, सम्पादक

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!
Close