साहित्य का सोपान

वो बचपन के दिन…

वो बचपन के दिन…

सुनहरे से दिन थे वो, सतरंगी सी दुनिया
खिलती थी जिसमें ,
मस्ती मोजों की कलियां
भागते फिरते, मिट्टी के घरौंदे, हाथों से सजाते
करते अठखेलियाँ,
संग मिलकर, सहेलियां
गर्मी के दिनों में ,
पेड़ों पर चढ़ना
वो अमियों की चोरी
चटखारे लगा के
आंखें मटका के
मजे से थे खाते ,
तोड़कर पेड़ो से
भरते इमली की डलियां
कभी तो लंगड़ी करके पकड़ना
कभी गिट्टियों से
बाजी को चलना
कभी हार जाना
कभी था हराना
खेलते भागते ,
थीं अपनी सी गलियां
न कोई फिक्र
न डर का ही जिक्र
गुड्डे और गुड़ियों की
सलोनी सी दुनियां
महकती वो बगिया
तितलियों को पकड़ना
पोशम्पा में
एक दूजे से अड़ना
मुस्काने बिखराती
वो यादों की गलियां
सुनहरे से दिन थे
वो सतरंगी सी दुनियां
खिलती थीं जिसमें
मस्ती और मोजों की कलियां

डॉ प्रतिभा गर्ग
गुरुग्राम हरियाणा

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!
Close