सीहोर

…….. आखिरकार लोकतंत्र जीत गया

……. आखिरकार लोकतंत्र जीत गयाऑल

दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश….. भारत में…. पिछले साल तीन कृषि कानून जिस तरीके से राज्य सभा में पारित किए गए….. उस स्थिति को देखने के बाद से ही सत्ता की नीयत संदेह के घेरे में आ गई थी…..। किसान संगठनों ने जब इसका विरोध शुरू किया….. तो उन्हें दिल्ली कूच करने की नोबत आई…. टिकरी , गाजा, या राजस्थान की बॉर्डर पर बीते साल के 26 नवंबर से अपना आंदोलन शुरू किया….. क्योंकि देश की राजधानी में देश के नागरिक…., किसानों को प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी …. दिल्ली की सरकार ने….। सर्दी में ठिठुरे….. गर्मी में झुलसे ….. बारिश में भीगे… आतंकवादी कहलाये…. खालिस्तानी बना दिये गए… और तो और देशद्रोही का ठप्पा लगाने का नैरेटिव भी गढ़ा गया….. राजनैतिक कठपुतली साबित करने की कोशिश भी हुई….. तमाम झंझावात को सहते रहे …. लेकिन डटे रहे किसान…. इस घोषणा के साथ…. कि अब घर वापसी तभी….. जब तीनों कृषि कानून किए जाएं रद्द….।
सरकार ने एक दर्जन दौर की बातचीत की…. किसानों की 16 में से 13 आपत्ति मान ली… संशोधन की मंशा भी बताई… लेकिन कानून रद्द करने की बात से सरकार मुकरती रही…… किसानों की एकता को तोड़ने के वह सभी हथकंडे अपनाए गए… जिनमे से बहुत से तरीके लोकतांत्रिक सरकारें अमूमन अपनाती नहीं है….. । बहुत से किसान संगठनों को सरकार के पक्ष में बयानबाजी कराने का प्रोपेगैंडा भी चलाया गया….., तीनों कृषि कानून को किसानों की किस्मत बदल देने की मास्टर चाबी बताया गया…. तो देश की अर्थ व्यवस्था के विकास के लिए मील का पत्थर प्रमाणित करने के लिए…. एड़ी चोटी तक का जोर भी लगाया गया….। यह भी बताने की कोशिश की गई कि…. इसमें किसान कोई नहीं…. दलाल और बिचौलियों का आंदोलन है….. जनता बन कर कुछ लोगों ने आपत्ति भी जताई….. इतना सब कुछ होते रहने के बीच छह सौ से ज्यादा किसानों की मौत हो गई….. लेकिन जिम्मेदारों के मुंह से सांत्वना के दो बोल भी न फूटे… 26 जनवरी को ऐसा नाजुक वक्त भी आया था…. जब लगा कि आंदोलन समाप्त हो जाएगा… लेकिन राकेश टिकैत के आंसुओं ने किसानों में जोश का सैलाब ला दिया….. और यह आंदोलन दुनिया का सबसे लंबा चलने वाला आंदोलन बन गया…।
आंदोलन की पृष्ठभूमि का उल्लेख….. किया जाना आवश्यक इसलिए हो गया कि…. जब सुप्रीम कोर्ट मे इन तीन कृषि कानूनों को लेकर कई याचिकाएं विचाराधीन है…… और सर्वोच्च न्यायालय ने .. इन कानूनों को डेढ़ साल के लिए…. प्रभावहीन कर दिया हो….. और गुरुनानक देव जी की जयंती के मौके पर….. प्रकाशोत्सव की बेला में…. अचानक केंद्र सरकार ने…. इन कानूनों को वापस लिए जाने की घोषणा की है…… यह कदम आंदोलनरत किसानों के नजरिए से…. विपक्षी दलों के बयानों में…. स्वागत योग्य है….. । सवाल यहीं से उठता है कि जब आंदोलन को एक साल होने को है … और सरकार ने और उसके समर्थकों ने इस आंदोलन को कभी गंभीरता से जिक्र के काबिल नहीं समझा…. बल्कि ग्यारह महीने पहले….. सत्ता इन किसानों से एक कॉल की दूरी पर होने की बात कहती रही…. उस कॉल का इंतजार भले ही पूरा न हुआ हो … परंतु किसानों की मुराद जरूर पूरी हो गई….। अकस्मात फैसले के पीछे निहितार्थ को तलाशने की कोशिशें…. आज चेनलो पर उपस्थित पैनल मरण होगा….. तो कुछ पैनलिस्ट इसे सरकार का ऐतिहासिक कदम साबित करने की पुरजोर आवाज उठाएंगे….. कहना न होगा कि… यह वही पैनलिस्ट होंगे जिन्होंने तीन कृषि कानूनों को किसानों के भाग्य बदलने वाला बताया होगा…..। तो कुछ सरकार के इस कदम में भी राजनैतिक बिसात पर चली गई एक चाल मान रहे होंगे… तो कुछ समर्थक इसको मास्टर स्ट्रोक बताएंगे….. जबकि असलियत कुर्सी के खिसकने का डर भी हो सकता है….।
इसी बीच में खबर यह भी है कि किसानों का संयुक्त मोर्चा…. आगे की रणनीति पर विचार करने में जुट गया है…..। उसका अगला कदम न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम एस पी) …. को कानूनी जामा पहनाने को लेकर हो सकता है….।
इस पूरे घटनाक्रम में गौरतलब बात यह है कि… सत्ता में बैठे नीति नियंताओं को अपने निर्णय पर अडिग माना जाता रहा है….. और इस आंदोलन ने यह तो जता ही दिया कि… संगठन में शक्ति है…. कितने ही कड़क निर्णय लेने वाले हों…. लोकतंत्र में लोक की आवाज को दबाया नहीं जा सकता… कुचला नही जा सकता….. डराया नहीं जा सकता…. आखिरकार लोकतंत्र विजयी होता है..।

शैलेश तिवारी

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