सीहोर

फिर देना मंजिल…

फिर देना मंजिल

जीवन धारा ऊंची नीची
रखना तुम पंख हौसलों के
संघर्ष कठिन जितना होगा
पाओगे लक्ष्य मधुर उतना
पटरी जैसी जीवन गाड़ी
ऊबड़ खाबड़ रस्तों पर भी
धीरे धीरे एक कदम बढ़ा
मंजिल तक ले ही जायेगी
शिक्षा की ज्योत जगाकर के
मां राह दिखाएगी तुमको
संग अपने जैसे औरों को
जीवन में आगे लेकर चल
जो भी जैसा भी जहां मिले
बस दिल में आशा भर लेना
अंधियारे पथ पर भी हरदम
दीपक उम्मीदों का रखना
जो दिया हमे उस ईश्वर ने
स्वीकार हृदय से कर लेना
श्रम की पूंजी मन मंदिर में
सपनों को मंजिल फिर देना।

मीतू मिश्रा, हरदोई, उत्तरप्रदेश

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