सीहोर

और आंख खुल गई…

और आंख खुल गई

शशि की आंखों में आज भी नींद नहीं थी, जबकि पिछली दो रातें भी इसी तरह जागते हुए काटी थी। बाबूजी और मां ने बहुत कहा कि आराम कर लो बेटा.. लेकिन शशि ने उनकी एक न सुनी बैठी रही आशु के पलंग के पास। अस्पताल के रातें कराहट सुनते सुनते बीतती हैं। उस पर जीवन साथी आशु अगर दुर्घटना में घायल होकर बेसुध अस्पताल के बिस्तर पर पड़े हों तो भारतीय पत्नी को नींद कैसे आए। हर समय हर घड़ी बस आशु के स्वस्थ होने की कामना । कभी विचार यह भी आता कि ऐसा उसके साथ क्यों हो रहा है। तभी अस्पताल के प्राइवेट वार्ड की दीवार घड़ी ने दो बजने की मुनादी की । शशि की निगाहें घड़ी के काँटों की गति पर ठहर गई। अब उसे घड़ी के कांटे उल्टे चलते नजर आने लगे।
वो रात याद गई जब रात के बारह बजे थे शशि करबटें बदल रही थी एक बेचैनी थी ,अभी तक आशु दफ्तर का काम कर रहें हैं, फोन उठाकर नम्बर लगा दिया ,आशु ने फोन उठाया.. आशु बहुत जल्दी में था …”आता हूँ बीस मिनट में” कहा और पीछे से किसी महिला के हँसने की आवाज़ सुनाई दी, फोन कट गया । शशि सोचने लगी इतनी देर तक दफ्तर का काम तो नहीं होता है पहले तो जल्दी आते थे और देर होती थी तो फोन करके बता देते थे ,आजकल ना फोन करते हैं ना जल्दी आते हैं पहले ये सब नहीं होता था दफ्तर की बातें भी मुझसे बताते थे हजारों सवाल मन की भूमि पर अंकुरित हो गए…। उन सवालों में एक सवाल शक का भी था जो समय के हिसाब से अपनी जड़ें मजबूत करता जा रहा था और यकीन के पेड़ में तब्दील होता जा रहा था।
अब शशि की आँख से कुछ नहीं छुपा था। शशि की ननद और सासू माँ शशि को बहुत प्रेम करती थी शशि ने आशु की हरकतों का सब हाल सासू माँ से कह डाला, शशि की सासू माँ ने कहा मै कल आ रही हूँ । इतने में घन्टी बजी, रात को दो बज चुके थे दरवाजा खोला … आशु ने शशि से कहा बहुत थका हुआ हूँ दफ्तर में बहुत काम था कमरे में जाते ही सो गया शशि को अब को विश्वास हो गया था ये किसी महिला के साथ थे।
रात भर विचार मंथन चला ,सुबह हो गई रात को आँख भी नहीं लगी फोन की घन्टी बजी सासू माँ का फोन था वो भी रात भर नहीं सो पाई थी फिर ननद का फोन आया ननद बहन की तरह थी, बोली “भाभी माँ के साथ मै भी आऊगीं । हम आज नहीं कल आएगें ।”
अब वो शांत थी एक औरत ही औरत की दुश्मन होती है, और एक औरत चाहे तो सबसे अच्छी सहेली भी ,,इतने में आशु उठा और दफ्तर के लिए तैयार होने लगा। आज वो बिना नाश्ता किए चला गया पर शाम को जल्दी आ गया। शायद उसको शशि के व्यवहार से कुछ अंदाज लगा गया था। लेकिन अब शशि खुश थी । खुश होने की वजह भी थी । सासु मां और ननद ने आशु की हकीकत जानने की तरकीब जो बताई थी। उसने शांति के साथ उस तरकीब को अमलीजामा पहना दिया था।
इधर आशु बहुत चुप रहने लगा था बात भी क्या करे ,उसने दूरियाँ जो बना ली थी।
ऑफिस से लौट कर आता और दूसरे कमरे में लैपटॉप ले कर चला जाना उसकी दिनचर्या सी बन गई। अब जैसे शशि ऐसा ही चाहती थी । वो शांति से बैठ गई, उधर कमरे में आशु की विडियो काॅल
चालू हो गई ,शशि ने अपनी सासू माँ को बताया कि जैसा आपने कहा था मैने वैसा ही किया है ।
आशु किसी महिला से ही विडियो काँल कर रहा था। शशि चाय ले कर गई ,शशि को देखकर आशु ने वीडियो काॅल काट दी, बोला मीटिंग चल रही है ।
शशि चुपचाप बाहर आ गई उसको तो चाय के बहाने कमरे में सब युक्ति के अनुसार हो रहा है या नहीं ये देखना था।
सब कुछ प्लानिंग के हिसाब से चलता देख अब वो खुश हुई और सासू माँ को फोन किया “आप चली हो या नहीं? आपके भरोसे ये सब कर रही हूँ। ”
“अरे नहीं बिटिया चल पडे है बाबू जी भी आ रहे है साथ में । लगभग चार घन्टे लगेगे ,खाना मत बनाना नही तो आशु को पता लग जाएगा ।” सासु मां ने उधर से जवाब दिया।
अब शशि ने चैन की श्वास ली, इतने अच्छे सास, ससुर मिले ये सोच कर प्रसन्नता से हृदय भर गया, पर आशु को लेकर बहुत दुखी भी थी, कोई कैसे इतना बदल जाता है। इतने में आशु की आवाज़ आई …” आज खाना नहीं मिलेगा क्या!”
शशि ने शान्ति से उसको खाना दिया और बाहर आ गई । शशि के विचार रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
समय बीतता गया, इतने में फोन की घन्टी बजी,सासू माँ का फोन आया,
” बिटिया दरवाजा खोलो!”
देखा घड़ी में रात के बारह बज चुके थे
शशि ने धीरे से दरवाजा खोला ओर स्वयं को रोक नहीं पाई। आँखो से आँसू फूट पडे़ ,ननद ने गले से लगा लिया बाबू जी ने कहा “हम तेरे साथ हैं मन छोटा ना कर बिटिया! ” सासू माँ ने पूछा …” आशु कहाँ है?”
शशी से कुछ कहा न गया उस कमरे की तरफ इशारा कर दिया जहां लैपटॉप लिए आशु बैठा हैं।
बाबू जी ने दरवाजा खोला तो आशु की किसी से बात चल रही थी …..।
अचानक बाबूजी को सामने देख आशु डर गया, बोला ” दफ्तर की ही बात चल रही थी…..।”
बाबू जी ने कहा ” मैने कुछ पूछा तुमसे! शशि क्यों उदास है ये बताओ मुझे? ”
आशु कुछ नहीं बोल पाया । बोलने की कोशिश में हकलाने लगा। तभी शशि से सासु माँ ने कहा ” “बिटिया मैने जैसा कहा था तुमने किया? ”
“जी” ही निकल सका शशि के मुंह से….
” तो दिखाओ सबको ” सासुजी बोली
शशि डर रही थी कि न जाने अब क्या होने वाला है पर तरकीब ननद की थी ,आशु को समझ नही आ रहा था आखिर क्या हो रहा है
शशि ने कमरे से वह गुप्त रिकार्डिग कैमरा निकाला और बाबूजी की तरफ बढ़ाने लगी तो बाबूजी ने कहा …. “शशि टीवी स्क्रीन से कनेक्ट कर के चलाओ। डरो नहीं ,मै तुम्हारे साथ हूँ ।”
रिकार्डिग की शुरूआत हुई आशु अपनी पत्नी शशि की बुराई उस महिला से कर रहा था । मेरी पत्नी अनपढ़ है, कोई हुनर नहीं है और ना ही दिखती अच्छी है। कहीं ले जाओ तो साथ जाने में शर्म आती है। मेरी जिन्दगी बर्बाद हो गई । आशु जितनी कमी शशि की निकाल सकता था निकाल रहा था, आशु की इन बातों को देख और सुनकर बाबू जी की आँखें लाल हो गई थी। कमरे में जैसे सन्नाटा था।
” पर ये है कौन?” बाबूजी की रौबदार आवाज ने सन्नाटे को तोड़ा।
तभी ननद बोली….” अरे ये तो शशि तुम्हारी ही सहेली है ना? ”
शशि की धड़कने तेज हो रहीं थी आँखों से सैलाब वह रहा था, अपनों के दिये धोखे से पूरी तरह टूट रही थी, पर खड़ी रही जैसे हृदय पर पत्थर रखा हो। आशु ने एसा कभी नहीं सोचा था कि ऐसा भी हो सकता है। बाबू जी ने पूरा देखा और कहा शशि चलो हमारे साथ, इस नर्क में देवी का क्या काम। उसकी सहेली उसका घर तोड रही है ये सोच कर शशि को ज्यादा दुःख हो रहा था।
शशि अपने कमरे में आ गई ओर फूट फूट कर रोने लगी ,सासु माँ के पास शब्द नहीं थे पर हिम्मत रख कर कहा “हम तेरे साथ है।’ ननद की आँखो मे आंसू की धारा नहीं रुक रही थी। बाबू जी ने कहा मेरे एक नहीं दो बेटियाँ है। अब आशु धीरे से उस कमरे में आया, माफी माँगने लगा, कोई नही बोला शशि अपने कपड़े रख रही थी और रो रही थी आशु ने आवाज़ दी शशि…..
अब शशि ने ऐसे देखा मानो काली रूप प्रकट हो रहा हो। बैग उठाकर शशि बोली चलिए बाबूजी । पीछे मुडकर भी नहीं देखा आगे चल पड़ी और कहा रिश्तों की गरिमा हर व्यक्ति को होनी चाहिए वो सहेली थी मेरी, मैने भरोसा किया था तुम दोनों पर।
और जा कर कार में बैठ गई बाबूजी ने आशु के गाल पर थप्पड़ मारा और कार की ओर चल दिए सब कार में आकर बैठ गए कार चल पड़ी रास्ते में सब चुप रहे, घर पहुंचकर सब रोते हुए एक दूसरे को हिम्मत बंधाते रहे।
धीरे -धीरे समय बीत रहा था शशि को डान्स का शौक था, बाबू जी ने कहा बिटिया डान्स क्लास खोलो ,व्यस्त रहो तुम दुखी क्यों हो। मै साथ हूँ तुम चिन्ता मत करो ईश्वर सब देख रहा है, जाओ कल कपड़े खरीद कर लाओ अपने लिए और एक कुर्ता मेरे लिए भी लाना । शशि भी मुस्कुराने लगी ।
शशि ने डान्स सिखाना शुरू कर दिया अपने को व्यस्त कर लिया, पर धोखा देने वाले अपने हैं ये बार बार दुख देता रहता था । इस बीच आशु का फोन आया तीन माह के बाद लेकिन शशि ने नहीं उठाया
हजार सवाल मन में दौड पड़े। बाबू जी ने खाना खाते समय बताया कि ” आज आशु का फोन आया था मैने बहुत सुनाया है, बिटिया शशि तुमसे बात करना चाहता है, मैने मना कर दिया। तूने उसके साथ जो किया है अंदेशा भी है ।”
शशि ने बोला मैने भी फोन नहीं उठाया बाबूजी!
अब लगभग सात माह हो चुके थे। एक दिन दरवाजे की घन्टी बजी । काम बाली बाई ने दरवाजा खोला! “अरे देखो भैया आए हैं…”
सब लोग घर में ही थे शशि क्लास ले रही थी ,अब बाबूजी ने आशु पर प्रश्नों की झड़ी लगा दी…. क्यों आए हो यहाँ मेरी इज्ज़त का दिवाला निकालकर चयन नहीं मिला? शशि को धोखा देते शर्म नहीं आई? किसी बाहर की महिला से इस घर की बहु की बुराई करते शर्म नहीं आई ? माँ ने भी अपने प्रश्न उछाल दिये, क्या कमी है शशि में? उसकी किस्मत फूट गई जो तुम जैसा पति मिला ,आशु अपनी गलती के लिए माफी माँग रहा था ,इतने में शशि बाबू जी के लिए चाय लाई, शशि ने आशु की तरफ देखा भी नहीं, आशु ने कहा मै जा रहा हूँ पर मै फिर आऊंगा।
समय बीतता गया एक साल निकल गया, आशु फोन करता रहता था माँ को, पर माँ भी सही से बात नहीं करती थी। शशि का माँ बाबूजी बहुत ध्यान रखते थे सहेली बन कर ननद भाभी भी गपशप करती थी एक दिन सब शाम को बैठे थे। तभी एक फोन आया कि आशु की कार का एक्सीडेंट हो गया है। अस्पताल का पता भेज रहा हूँ, फोन आशु के मित्र का था ,ये सब सुन कर शशि खुद को नहीं रोक पाई बोली बाबूजी, माँ जल्दी चलिए, बाबूजी ने कार निकाली सब अस्पताल चले गए,, देखा आशु होश में नही था।
तभी से शशि दिन रात एक करते हुए आशु की सेवा में लगी थी। यादो की दरिया की लहरों में शशि इतनी डूबती तैरती रही कि सुबह के सात बज चुके थे। डॉ के राउंड का समय हो रहा था। शशि ने अटैच वाशरूम में जाकर चेहरे पर पानी मारकर खुद को तरोताजा किया। आज तीसरा दिन था आशु को बेहोश हुए। वह कुछ और सोच पाती इससे पहले आशु ने हल्के से आंख खोली। यह देख शशि की आंखें भर आईं। बाहर बैठे मां बाबूजी को पुकारा। सब तुरंत आ गए। आशु ने देखा शशि और माँ पास में बैठे हैं। उसकीआँखो से जल धारा बहने लगी जैसे प्रायश्चित कर रहा हो। इतने में बाबू जी बोल पडे तीन दिन से हम यहाँ है ,शशि सोई तक नहीं, कहाँ है तेरी महिला मित्र!आशु की आंसू बहाती आंखों ने शशि की तरफ देखा… मानों आंसू ही माफी के शब्द बनकर बह रहे हों। शशि ने आगे बढ़कर उसके उठ रहे दोनों हाथों को अपने हाथों में थाम लिया।

सुरभि डागर, बिजनोर, उप्र

समीक्षा

और आंख खुल गई….. शीर्षक से सुरभि डागर जी द्वारा रचित कथानक यूँ तो एक आम विषय पर लिखा गया है…. पति और पत्नी के बीच…..” वो”….. का आना …. आज के दाम्पत्य जीवन में कुछ ज्यादा हो चला है…. लेकिन इस कथानक में खासियत यह है कि…. शशि की ससुराल वाले…. शशि का साथ देते हैं… आम तौर पर ससुराल पक्ष पति के साथ होता है…। वैसे देखा जाए तो अनाचार की खिलाफत होना चाहिए… लेकिन ऐसा होता नहीं है… अनाचार के समर्थक भी मिल जाते हैं…. जिससे दाम्पत्य जीवन की दरार गहरी दर गहरी होती जाती है……. परिणाम में बिखराव ही आता है….। कथानक में हिडन कैमरे की सलाह नायिका की ननद देती है…. सास और ससुर भी बहु के पक्ष में खड़े होकर… अपने पुत्र की हरकतों का विरोध करते हैं….. इसके अलावा एक सबक भी है… जो कथानक के अंत में ही प्रकट होता है…. जिसमें नायक आशु का एक्सीडेंट हो जाना… और उसकी तीमारदारी में शशि का तीन रात जागना…. नायक की आंख खुलने पर… उस महिला मित्र की अनुपस्थिति और आशु का माफी के लिए अपने दोनों हाथ उठाना…. नायिका का हाथ पकड़ लेना…. यह पंच लाइन… भारतीय दम्पत्ति की उदारता दर्शाती है… लेकिन इस लाइन पर चल रहे दम्पत्ति में से किसी एक को…. पाठ पढ़ाती है…. पुरुष के स्थान पर महिला होने पर तो पुरूष… तू औरों की क्यों हो गई…. का ढिंढोरा पीटता है… लेकिन पत्नी तो यह भी नहीं कह पाती कि… दोस्त दोस्त न रही… । कहानी में फ्लैश फिक्शन का शानदार उपयोग किया है… एक के बाद कड़ी को ख़ूबसूरती से जोड़ा गया है…. और सरल शब्दों में कहानी का ताना बाना बुना गया है…. दाम्पत्य जीवन में विश्वास के संकट को निमंत्रित नहीं करने की सलाह देती कहानी के लिए …. सुरभि जी बधाई…..।

शैलेश तिवारी, सम्पादक

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