साहित्य का सोपान

एक नजर…

उष्णता

सर्द रात की सर्द हवाएँ चुभती नहीं देह में
किन्तु तुम्हारा ये सर्द बर्ताव
खंजर सा उतर जाता है मन में ।

ध्यानमग्न हुए पगडंडी वाले पत्थर में
भी शायद स्पंदन हुआ मानो
दुखों से अभिमंत्रित किया किसी ने ।

ढूंढ रहा उन हथेलियों की उष्णता में
वो पिघलती कुंठाएँ
जो नजरबंद कर दी गईं मन के आशंकित कोने में ।

देह के दुख तो झपकियाँ ले लेते हैं देह में
पर मन की वो सर्द अटारियाँ
कुरेदती रहती हैं चिंगारियाँ बुझी आग में ।

शुभा मिश्रा
जशपुर, छत्तीसगढ़

एक नजर….

उष्णता….. कविता क्या है … देह और मन के अंतर को स्पष्ट करता हुआ एक दर्शन है…. उपनिषद की ऋचा की तरह रची गई यह रचना…. मन की चंचलता को गहरे से रेखांकित करती है…. बताती है कि शरीर का दुःख हो तो वह भी दूर हो जाता है… लेकिन मन का दुःख… राख चढ़े अंगारे की तरह है… राख हटी नहीं कि दहकना शुरू….। इनको सलीके से गंभीरता के साथ शब्दों को काव्य रूप दिया है…. शुभा मिश्रा जी ने….. बधाई हो…।

शैलेश तिवारी, सम्पादक

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