साहित्य का सोपान

विधा:लघुकथा

विधा:लघुकथा

आधिपत्य

उसके घर की दिवार से होते हुए घर के बाहर उगे बरगद के पेड़ की कुछ शाखाएं दिवार फांद कर उसके घर के अन्दर प्रवेश कर गयी थी । अब उसका उन शाखाओं से एक आत्मिक संबंध बनता जा रहा था । वह रोज उसे पुचकारता कभी उसके पत्तों पर पानी उलिचता, कभी घण्टो अपनी बालकनी में हाथ में चाय का कप लिए उसे निहारता ।
अब धीरे – धीरे उस बरगद के पेड़ से उसका एक नाता हो गया था। अब अपनी बातों में अक्सर वो उसका जिक्र करने लगा था कि, कितना विशाल, कितना सुंदर है ये पेड़ !! नहीं मेरा पेड़ !!
हाँ अब वो पेड़ जिसे उगाने में या पनपने में उसका कोई योगदान नहीं था उसे अपना लगने लगा था ।
उसने देखा कुछ पंछी जो अक्सर बरगद कि शाखाओं पर बैठ कर सुंदर गीत गुनगुनाते थे, अपने कलरव से वातावरण को खुशनुमा कर देते थे, अपनी चोंच में कुछ तिनके लेकर पेड़ कि शाखा की ओर बढ़ रहे हैं ।
अचानक उसे लगा, उसका आधिपत्य जो एकल था अब डगमडगाने लगा है। अब शायद कुछ दिन बाद इस पेड़ के पत्ते और शाखाएं पंछी के द्वारा बनाए गए नीड में पनपे नव – आगंतुक के साथ खेलने लगेंगे और ये भी हो सकता है कि कुछ दिन बाद ये पंछी जो उसकी डाल पर अपना नया आसरा बसाएंगे वो ऐसा कहने लगेंगे कि,” हमारे घर का पता है श्री कुंज के पांचवी गली में मिश्रा जी के घर के पास वाला पेड़।”
तभी उसके मुँह से निकला, ” नहीं नहीं मैं ऐसा नहीं होने दे सकता… ये पेड़ मेरा और सिर्फ मेरा हैं।”
उसके दिमाग में एक विचार कोंधा और वो नया कुर्ता पाजामा डाल, बाहर गली के नुक्कड़ पर चाय की थड़ी पर बैठे कुछ जवान और बुड्ढों से कहता हैं, “पता है मेरे बरगद को किसी की नजर लग गईं , रात में अजीब अजीब आवाज़ आती हैं उस पेड़ से, लगता है कोई पीड़ित आत्मा या भूत पिशाच ने शायद अपना वास कर लिया है उस पर ।”
सभी लोग फटी आँखों से उसे देखते हैं और जादू – टोने करके उस पेड़ को मुक्त कराने की सलाह देते हैं ।
वो घर आते ही अँगीठी में कुछ जड़ी बूटियां डाल कर अग्नि प्रज्वलित करता हैं और देखता हैं पंछी चोंच में तिनका दबाए पेड़ की उल्टी दिशा में प्रस्थान कर चुके हैं । वो अँगीठी की अग्नि को पानी के छिंटो से शाँत करता है, अपनी बाहों से बरगद के तने को गले लगाता हैं और मन ही मन मुस्कुराता हैं ।

रूपल उपाध्याय
वडोदरा, गुजरात

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