साहित्य का सोपान

साइकिल

साइकिल

डीएलएफ साईबर सिटी गुड़गांव के एक आई टी आफिस में लंच टाईम था।अनिरुद्ध खाना खाकर विंडो पर आकर खड़ा हो गया।वो उस कंपनी का मैनेजिंग डायरेक्टर था 19 वें माले से पूरे एरिया की झलक मिलती थी।तभी उसकी नजर एक साईकिल चलाते हुए आदमी पर पड़ी जिसने आगे वाले डंडे पर अंगोछे से स्टील का टिफिन बांध रखा था और पीछे छाता लगा रखा था स्टैंड पर।

“अनिरुद्ध बता कहाँ चलेगा ?आज मेरी छुट्टी है “अनिरुद्ध के कंधे पर हाथ रखते हुए उसके पिताजी ने पूछा
यह सुनकर अनिरुद्ध की आँखे चमक उठी उसने कहा
“पापा पास के गांव में मेला लगा है वहीं चलो”
पापा ने साइकिल निकाली और खाने के लिए टिफिन आगे छाता ले लिया।साइकिल के आगे वाले डंडे पर नीचे की साईड टिफिन बांधकर उस डंडे पर एक चादर लपेट दी क्योंकि अनिरुद्ध को आगे बैठना अच्छा लगता था और उसे कोई परेशानी ना हो एक छोटी गुदगुदी गद्दी तैयार की।
अनिरुद्ध खुशी खुशी बैठ गया।दूसरा गाँव तकरीबन 15 किमी दूर था।
उसके पापा चल दिये पूरे रास्ते अनिरुद्ध उनके कान खाता रहा इतने प्रश्न हर चीज को देखकर जैसे मील के पत्थर देखकर
“पापा ये क्यों लगाये जाते हैं?”
पावर हाउस देखकर
“ये क्यों होता है?”
तो कभी चिडियों कबूतरों को बिजली के तार पर बैठे देख यह पूछना
“इनको करंट क्यों नही लगता?”
ऐसे बहुत सारे प्रश्न पूछे उसने और उसके पापा ने हर प्रश्न का सार्थक उत्तर देकर शांत किया।मेले पहुंचकर खूब आनंद लिया अनिरुद्ध ने।बापस लौट रहे थे तो बीच रास्ते में पिताजी बोले
“चल थोड़ा उस पेड़ के नीचे बैठते हैं।”
पिताजी ने स्टैंड पर साइकिल लगाई और बैठ गये और उनकी आँख लग गई।अनिरुद्ध की नजर उनके हाथों पर पड़ी।उनके हाथों में साईकिल चलाते चलाते ठेठ पड़ गई थी (खाल टाईट होकर नीले पड़ना) पैरों का भी यही हाल था।अनिरुद्ध को यह सब देखकर बड़ा बुरा लग रहा था कि पापा को इतना साइकिल चलाने पर मजबूर किया।काफी टाईम हो चुका था।अनिरुद्ध बोला
” पापा उठो चलो”
लेकिन पिताजी का कोई रेस्पांस नही मिला जब जोर से हिलाया तो पिताजी का शरीर निढाल होकर एक साइड गिर गया।
अनिरुद्ध की समझ में कुछ नही आया वह जोर जोर से रोने लगा पापा पापा कहता हुआ।फिर रोड पर आकर चिल्लाने लगा

“कोई मेरे पापा को उठाओ पापा बोल नही रहे हैं कोई पापा को उठाओ ”

काफी लोग बस देखकर निकल गये
फिर कुछ उसके गाँव के लोग निकले और बोले
“अरे ये तो श्याम बाबू हैं ”
जल्दी से सबने घोड़ा गाड़ी में डाला और डाक्टर की तरफ ले चले इधर अनिरुद्ध का रो रोकर बुरा हाल था पापा कोई उत्तर नहीं दे रहे थे उसके।डाक्टर के यहाँ पहुंचे तो डाक्टर ने मृत घोषित कर दिया ह्रदय गति रूकने से।इधर उसके गाँव में यह खबर पहुंची तो माँ नंगे पैर दौड़ पड़ी बेसुध होकर पूरे गाँव में हाहाकार मच गया श्याम बाबू के नाम का बहुत मिलनसार और हँसमुख व्यक्ति थे।पैसे से ज्यादा सम्मान कमाया था उन्होंने।
अनिरुद्ध को कुछ नही समझ आ रहा था।उसके छोटे छोटे हाथों से पिताजी की अर्थी को मुखाग्नि दी गई। वो यही कहता रहा “मैं क्यों ले गया पापा को?”
इतने में अनिरुद्ध को किसीने झकझोरा
“अनिरुद्ध क्या हुआ ?”
अनिरुद्ध की आंखो में आंसू थे उसने साफ किये और बोला कुछ नही।
वो झकझोरने वाला हाथ उसकी पत्नी का था।वो उसकी कंपनी की भी पार्टनर थी।वो बोली
“पिताजी की याद आई क्या?”
तुम कबतक अपने को दोषी मानते रहोगे।?
अच्छा सुनो चलो कांफ्रेंस रूम में ”
वो उसे लेजाकर प्रोजेक्टर आन किया और काल कनेक्ट की अपनी सासु माँ को
और बोली
“देखो”
अनिरुद्ध ने देखा मम्मी केदारनाथ के मंदिर के बाहर खड़ी थीं हाथ हिला रही थी साथ में अनिरुद्ध के बेटे बेटी थे।
“माँ बोली बेटा कैसा है तू?खाना खा लिया तूने ?देख तेरी औलाद की जिद सारे तीर्थ करा रहे वो क्या कहते इंग्लिश में हाँ सरप्राइज दिया इन लोगों ने और कहा पापा को भी नही बताना।ऐसी औलाद सबको दे भगवान ”
अनिरुद्ध की आंखो से आंसुओ की धार बह निकली फिर उसकी पत्नी ने माँ को सारी बात बताई फिर माँ बोली
“देख बेटा तू अपने को दोषी मत मान सब विधाता की लेखनी है उस पर विश्वास कर और आगे बढ़ दिल से भार निकाल दे यह।बहुत सोचता है पापा की तरह अपने चल खुश रह”
इतना कहते हुए माताजी ने अपने आँसू पहुंचे। और सबको केदारनाथ के लाईव दर्शन कराये।सबने जय कारा लगाया हर हर महादेव।

-अनुज सारस्वत , हरिद्वार, उत्तराखंड

समीक्षा

कहानीकार अनुज सारस्वत की कहानी सायकिल एक ऐसी कहानी है जो अपने माता पिता के प्रति समर्पित बेटे अनिरुद्ध की जबानी है…..। अपनी तरक्की और प्रतिष्ठा पाने के बाद भी वह अपनी मल्टी के 19 वें माले पर खड़ा होकर जब एक साइकिल चालक को ठेठ उसी अंदाज में देखता है जिसमें उसने अपने पिता को देखा था…. जो अपने गांव के सम्मानित व्यक्ति थे …. लेकिन 15 किलोमीटर दूर जे गांव में लगे मेले को उसके देखने की जिद ने उसके पिता को साइकिल चलाने को मजबूर किया और…. परिणाम में अत्यधिक श्रम से हृदय गति रुकी और उसके सिर से पिता का साया उठ गया….।
कहानी का यह हिस्सा अनिरुद्ध के जीवन का ऐसा किस्सा बन गया जो वह चाह कर भी कभी भूल न पाया… स्वयं को दोषी मानता रहा …. अंत में केदारनाथ से मां का लाइव होना .. और ऐसी औलाद सबको देने का …. कहना माता पिता के प्रति संतान के कर्तव्य भाव को जगाता है…. खासकर उस दौर में जिस ज़माने में वृद्धाश्रम की तादात लगातार महंगाई की तरह बढ़ती जा रही हो… यह दर्शाने के लिए काफी है कि… जिन उंगलियों को पकड़कर चलना सीखा…. जिन कंधों पर चढ़कर दुनिया देखी… उनका मान सम्मान कभी कम न होने पाए….।

शैलेश तिवारी, सम्पादक

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