साहित्य का सोपान

मैं और मेरे पति…

मैं और मेरे पति

संयोग से हम दोनो ही कवि हैं
अपने अपने आकाश के दमकते रवि हैं
सो दोनो शब्दों में जब उलझ जाते हैं
एक दूजे के बंदिश से भी जरा सुलझ जाते हैं
कभी कभी दोनो पास ही होते है
पर ख्यालों में यू खोए होते है कि बस ख्यालों के ही खास होते हैं
कुछ फायदा तो कुछ नुकसान हैं
पर इस लत को छोड़ना कहा आसान हैं

हा चलिए फिर मुद्दे पर आती हूं
क्या कहना चाहती हूं वो बताती हूं
पति को हास्य रस लुभानी हैं
तो पत्नी श्रृंगार की कहानी हैं
एक की विधा हंसाती हैं
तो एक की नेह प्रेम सिखाती हैं
हुआ यूं कि जब हम दोनो साथ एक कवि सम्मेलन में गए
वहा के कवियों को हम कुछ ज्यादा खल गए
पति हंसा के लोटपोट करते हैं
तो आप बस प्रेम की बाते सुनाती हैं
ये तो बताइए इस “हंसोड़” में आप प्रेम कहा पाती हैं??
या कुछ इधर_उधर
ही ही ही,,, मेरा मतलब
बीती कोई कहानी से आप रस चुरा लाती
बुरा न मानियेगा
मैंने मज़ाक किया हैं
एक बात थी मन में उसको साफ किया हैं

मैं तो पूछो न पूरा भन्ना गई
पति पर महफ़िल में गुस्सा कैसे उतारू
इसलिए उसे दबा गई
सोचा घर पर कयामत ही आज लाऊंगी
क्या जरुरत हैं हास्य लिखने की ,आज तो खूब रूलाइंगी

जैसे तैसे कवि सम्मलेन की समाप्ति हुई हम घर आए
मैंने कहा ,,, ऐ जी हास्य क्यू लिखते हों
वाह वाही तो खूब लूटते हों
पर मेरे प्रेम रस की टांग खींचते हो
आज एक भद्र ने मेरी मज़ाक उड़ायी
उसकी हंसी मुझे तनिक नहीं भायी
तुम भी क्यू नहीं श्रृंगार रस लिखते हों??
और मुझे अपनी कविताओं में खींचते हों।

फिर मेरे हंसोड़ पति मुस्कुराए
मुझे प्यार से अपने पास बुलाए
और बोले ,,,
हे प्रिय ! हम दोनो अगर एक जैसे हो गए तो
हमारी लेखनी असहज होगी
कविताएं तो बनेंगी पर वो सहज न होगी

मैं तुम पर जो नेह लुटाता हूं
उससे प्रेम लिखती हो
और तुम्हारी खुशहाली से मस्त मै हास्य बनाता हूं।
यू हम दोनों एक दूसरे के धार हैं,
और हमारी भिन्न विधा ही हमारी कविता का आधार हैं।

सो यूं अब मैं बात समझ गई
उनके सानिध्य में मुस्कुराई और अपने प्रेम रस में फिर से बस गई…।।

दीप्ति श्रीवास्तव
पुणे, महाराष्ट्र

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