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बंगाल का काला जादू

जयंत शाह

बंगाल का काला जादू विश्व प्रसिद्ध है। खासतौर पर यह वही स्थान है जहां शंकर जी ने प्रथ्वी पर लेटकर मां काली के क्रोध को शांत किया था। खासियत यह कि मूर्ति को स्पर्श करने वाले व्यक्ति अद्भुत बन जाते हैं जैसे कि स्वामी परमहंस एवं महात्मा गांधी___…..

आसुरी शक्तियों पर देविय शक्ति की विजय का पर्व विजयादशमी संपूर्ण भारत वर्ष में उल्लास के साथ मनाया जाता है।
अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दसवीं तिथि के दिन देश में मनाए जाने वाले दशहरा पर्व को बंगाल में सिंदूर खेला के रूप में मनाया जाता है। सिंदूर खेला की रस्म अपने पति एवं बच्चों को सभी बुराइयों से बचाने में नारित्व की शक्ति का प्रतीक है।
पारिवारिक कलह एवं पड़ोसियों के बीच छोटे-मोटे झगड़े इस अनुष्ठान के माध्यम से सुलझाए जाते हैं ।

विशेषता:

प्राय: मनुष्य द्वारा किये जाने वाले अनुष्ठानों का उद्देश्य स्वयं एवं स्वयं के परिवार की उन्नति की कामना होता है।
परंतु बंगाल से करीब 450 वर्ष पूर्व शुरू हुई इस परंपरा में
सिंदूर खेला के माध्यम से हिंदू महिलाएं एक दूसरे के सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं।
“सिंदूर खेला” के दौरान पान के पत्तों से मां के गालों को स्पर्श किया जाता है इसके बाद उनकी मांग में सिंदूर भरा जाता है और माथे पर भी सिंदूर लगाया जाता है।
विसर्जन के दिन अनुष्ठान होता है।
शुरुआत महाआरती से होती है और देवी मां को शीतला भोग अर्पित किया जाता है ,जिसमें कोचुर शाक, पंता भात और इलिश माछ को शामिल किया जाता है।
पूजा में एक दर्पण को ठीक देवी के सामने रखा जाता है और भक्त देवी दुर्गा के चरणों की एक झलक पाने के लिए दर्पण में देखते हैं।
मान्यता है कि जिसे दर्पण में मां दुर्गा के चरण दिख जाते हैं उन्हें सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
मान्यता अनुसार मां दुर्गा पार्वती के मायके आने एवं दसवे दिन वापस ससुराल के लिए विदाई के स्वरूप मनाए जाने वाले इस भव्य सिंदूर “खेला उत्सव” पर सभी को हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई।

जयंत शाह (स्थानीय संपादक , एमपी मीडिया पॉइंट)

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