साहित्य का सोपान

स्त्री-जीवन एक तपस्या

स्त्री-जीवन एक तपस्या

करुणा ,ममता और स्नेह का अविरल झरना है नारी,
सद्भावना है ,एहसास है , त्याग और तपस्या है नारी।
सेवा है ,फूंक से ठंडा किया हुआ कलेवा है नारी।

जीवन को उत्तम प्रसाद
प्रदान करती पंचमेवा है नारी।
पल-पल समय के साथ खुद को बदलती,
टूटती स्वयम पर तिनका-तिनका सहेजती है नारी।

कभी माँ कभी बहन ,
पत्नी और बेटी के हर रूप में करती है त्याग।
बुरे समय में भी अटल चट्टान बन जाती है नारी।

हां ये वो शक्ति है जो अपने रक्त के कण-कण से इस संसार को सुंदर बनाती है।
कभी सीता,कभी अहिल्या तो कभी यशोधरा बन कर
तप त्याग की पराकाष्ठा को छू लेती है नारी।

न माँ के घर ,न पति के घर ,न पुत्र के घर को अपना कह पाती है
पर सदैव अग्नि-पथ पर चलती
खुद कांटो की सेज को चुन
सब के जीवन में खुशियों के पुष्प है खिलाती नारी

नमन है सदा, ईश्वर की अनुपम कृति तुझे जो तू है तो
सृष्टि चलायमान है सारी।

मीनाक्षी मोहन “मीता’
पंचकूला,हरियाणा

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!
Close