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रक्तबीज वधे देवी, चंड मुंड विनाशिनी। रूपं देहि-जयं -देहि यशो देहि,द्विशो जहि…

जयंत शाह

जय माता रानी। एम पी मीडिया पॉइंट के माध्यम से आज हम चलते हैं पुण्य सलिला मां नर्मदा के समीप विंध्याचल पर्वत माला पर विराजित मां बिजासन देवी के दर्शनार्थ। विंध्याचल पर्वत माला की 800 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थापित सिद्ध देवी पीठ सलकनपुर वाली माता के धाम। मध्यप्रदेश के सीहोर जिले की रेहटी तहसील के ग्राम सलकनपुर वाली माता बिजासन देवी मंदिर मे दर्शन के हेतु पहुंचने के लिए करीब 1000 से ज्यादा सीढ़ियां है । वर्तमान समय में रोपवे की भी व्यवस्था प्रसिद्ध देवी धाम पर है। सड़क मार्ग द्वारा निजी वाहन से भी मंदिर तक पहुंचा जा सकता है।प्रकृति के सुरम्य माहौल में स्थापित देवी दुर्गा मंदिर ने विराजित विंध्यवासिनी मां बिजासन देवी की कथा श्रीमद्भागवत पुराण में उल्लेखित है।

श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार

देवी दुर्गा ने देत्यों का संहार करने के लिए विभिन्न
अवतार लिए हैं। उदाहरण के तौर पर महिषासुर ,
धूम्रविलोचन, शुंभ निशुंभ जैसे राक्षसों का वध करने के लिए देवी दुर्गा ने अवतार लिए।
इन्हीं में से एक दैत्य था
“”रक्तबीज“‘ वह महाशक्तिशाली था क्योंकि रक्तबीज को भगवान शंकर से वरदान प्राप्त था जहां जहां उसके रक्त की बूंद गिरेगी वहां से एक और रक्तबीज दैत्य उत्पन्न हो जाएगा। ऐसे में देवताओं से युद्ध के समय जब भी कोई देवता रक्तबीज पर प्रहार करता और उसके रक्त की बूंद नीचे गिरती वहां पर एक और रक्तबीज पैदा हो जा रहा था। इससे परेशान होकर देवताओं ने मां दुर्गा से प्रार्थना की वह रक्तबीज का वध कर हमें इस समस्या से मुक्ति दिलाएं। देवताओं की प्रार्थना पर मां दुर्गा ने रक्तबीज से युद्ध किया।
मां दुर्गा ने देवी चंडिका को आदेश दिया कि जब भी वह रक्तबीज पर प्रहार करें तो चंडिका उसका रक्त पी जाएं।
चंडिका ने मां का आदेश मानते हुए वैसा ही किया राक्षस का गिरता हुआ वक्त पीना शुरु कर दिया, इससे नया राक्षस उत्पन्न नहीं हो पाया। इस तरह मां दुर्गा ने रक्तबीज का संहार किया।मां भगवती दुर्गा ने विकराल रूप धारण करके रक्तबीज नामक राक्षस का वध करके इसी स्थान पर विजय प्राप्त की थी।
मां दुर्गा की इस विजय पर देवताओं ने जो माता को “आसन” दिया , वही “”विजयासन धाम”” के नाम से विख्यात है।
मां भगवती का यह रूप बिजासन देवी कहलाया।

सलकनपुर मंदिर निर्माण की कथा

करीब 300 वर्ष पूर्व पशुओं का व्यापार करने वाले बंजारे इस स्थान कुछ विश्राम एवं चारे की व्यवस्था के लिए रुके।अचानक उनके पशु गायब हो गए। बंजारे पशुओं को ढूंढने निकले तो एक वृद्ध बंजारे को एक कन्या मिली। कन्या के पूछने पर बंजारे ने सारी बात कह बताइ। तब कन्या ने कहा कि आप यहां एक देवी का स्थान बनाएं एवं मां का पूजन अर्चन कर अपनी मनोकामना पूर्ण कर सकते हैं। कन्या के इशारे द्वारा बताए गए स्थान पर बंजारों ने मां भगवती की पूजा अर्चना प्रारंभ कर दी कुछ ही देर बाद उन बंजारों के खोए हुए पशु मिल गए।
चमत्कार से अभिभूत होकर बंजारों ने मंदिर का निर्माण करवाया।
इसके बाद पहाड़ी के नीचे ग्रामीणों का आना-जाना शुरू हो गया। और मनोकामनाएं पूरी होने के कारण भक्तों का तांता लगने लगा।
आज सलकनपुर धाम अपने भव्य एवं दिव्य आकर्षक रूप में श्रद्धालुओं एवं पर्यटक को की आस्था का प्रमुख केंद्र है।
जय मां विंध्यवासिनी🙏🙏🙏🙏🙏

जयंत शाह

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