साहित्य का सोपान

कन्याओं का तिरस्कार क्यों…

कन्याओं का तिरस्कार क्यों…..

लिख रही मम भाव

मानव मृगया ले आता था
कच्चा ही चबाता था

आग का आविष्कार किया
जीवन शैली परिष्कार किया

खेती की आई जब क्रांति
बसने के ही साथ छायी भ्रांति

स्त्री घर को लगी संवारने
थके पुरूष को लगी दुलारने

पुरूषों को पौरुष का दंभ हुआ
स्त्री कोमल बेल वह अबलंब हुआ

दुनिया विकसती- बढती गयी
वर्चस्वों के लिए लड़ती गयी

हर युद्ध विध्वंस घमासान में
स्त्री की सत्ता रही अवसान में

खुद भोगी बन नारी भोग्या रखी
नियत बिगड़ी तो व्यभिचार चखी

लगा कीमत खुद का व्यापार किया
कन्याओं का सदा तिरस्कार किया

नारी जो होनी चाहिए थी अनमोल
होकर रह गयी है अब बिनमोल

ताकतवर होना, यहां सब चाहें
बुढापे की लाठी, पूत की बाहें

कठिन, कन्या-पालन करना सुरक्षित
जटिल बहुत कन्यादान हिय- इच्छित

पूजन – भजन तक शोभे कन्या
पत्नी, प्रेयसी लगती है रम्या

पर, संतान तो पुत्र ही चाहते सभी
कोई खामखा मुश्किल पालता कभी!

इसलिए मांगें पुत्र रत्न की मन्नत
बेटियों को भेजें, सीधा गर्भ से जन्नत

और आंखे आगत कल देख न पाएं
पूतों के लिए सुघड़ वधू कहां से पाएं?

– स्मिता_श्री, बेगूसराय , बिहार

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