साहित्य का सोपान

ज्योति अम्बर से बरसे

ज्योति अम्बर से बरसे

तुमने
जब से छुआ
मेघ मन हुआ
ज्योति अम्बर से बरसे ।

सरसा हो गई रसा
कल्पना हुई सिन्दूरी
रोम-रोम में पुलक
नाचती मगन मयूरी

शब्द-शब्द में गान
अधर मुस्कान
सुरभि सांसों को परसे
ज्योति
अम्बर से बरसे ।

है जाने क्या बात
तुम्हारे नेह में
कस्तूरी सी महक
रही है देह में

सामवेद के छ्न्द
झरे मकरन्द
प्रीति के
पावन कर से
ज्योति
अम्बर से बरसे ।

डॉ. मधु प्रधान ,कानपुर

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