साहित्य का सोपान

बिटिया मां की दोस्त…

बिटिया मां की दोस्त

छोटा सा पहाड़ी शहर पिथौरागढ़। चारों तरफ ऊंचे ऊंचे पहाड़, हवा में लहराते हुए चिनार के पेड़ और बेहद शांत वातावरण । बिल्कुल किस्से कहानियों से निकला हुआ शहर लगता था। इस किताबी शहर की एक और सुरमई शाम थी वह। पेड़ों में चिड़ियाओं का शोर था मानो कह रहे हो दिन ढल चुका है और अब उड़ान की रुख घर की ओर करो और जल्दी जल्दी घर चलो। एक चरवाहा पगडंडी पर से बकरियों को हांकते हुए अपनी ही मस्ती में कोई लोकगीत गाता हुआ जा रहा था। धीरे-धीरे सूरज छिपता जा रहा था और चारों ओर सन्नाटा छाने लगा था। पहाड़ों में दिन जल्दी ढ़ल जाता हैं। तारे सूरज के जाने का इंतजार नहीं करते अपने नन्हे नन्हे पैरों से चलकर पूरे आसमान ढंक देते हैं। वादी में अंधेरे के साथ-साथ कोहरा भी छाने लगा था। कहीं-कहीं घरों में लाइट जलने लगी थी और अंधेरे में झांकती हुई हल्की-हल्की टिमटिमाती हुई लाइट जुगनूओं जैसी लग रही थी।
बाहर जितना सन्नाटा था तृषा के मन के अंदर उतना ही शोर था। तेज कदमों से चहल कदमी करती हुई वह पूरे कमरे में टहल रही थी।
तभी पीछे से उसकी बेटी मिष्टी की आवाज आई मम्मा ।
तृषा के होठों पर मुस्कान आ गई। उसने लाड़ से अपनी मिष्टी को देखा। वह उसके पीछे खड़ी मुस्कुरा रही थी। तृषा ने पूछा : कोल्ड कॉफी लाऊं क्या?
हां मम्मा: मिष्टी चहकी।
अच्छा मिस्टी यह तो बता कल कॉलेज के एनुअल डे फंक्शन में क्या पहनूं मैं : तृषा ने पूछा। यूं तो तृषा 36 साल की थी और कॉलेज महिला कॉलेज की प्रिंसिपल थी। लेकिन क्या पहनू सोचने में टीनएजर लड़कियों से भी ज्यादा समय लगाती थी।
मम्मा वो नीले रंग की शिफांन साड़ी है ना वह, आप उसमें बहुत अच्छे लगते हो आप वही पहनना : मिष्टी बोली
तृषा उसकी बात सुनकर मुस्कुराई और कोल्ड कॉफी बनाने रसोई में चली गई।
थोड़ी देर बाद मिष्टी चटखारे लेते हुए कोल्ड कॉफी पी रही थी और कह रही थी मम्मा आपके जैसा कोल्ड कॉफी कोई नहीं बना सकता।
तृषा कॉफी पीते हुए और मिष्टी से बातें करते हुए खिड़की पर जाकर खड़ी हो गई। साफ खिड़की में पीछे के पूरे कमरे का अक्श दिख रहा था जहां तृषा के अलावा कोई और नहीं था।
जिस मिष्टी से वह कब से बातें कर रही थी वह तो कभी पैदा ही नहीं हुई थी। वह तो उसकी अजन्मी बेटी है ।वह बेटी जिस का सपना उसने और आशु में साथ मिलकर देखा था। जो दुनिया में कभी आई ही नहीं लेकिन जिसकी कल्पना के साथ तृषा पिछले 18 सालों से रह रही है।
अजनमा बच्चा रेशम के धागों से बुना एक ऐसा पुल होता है जिसका एक सिरा असली दुनिया में होता और दूसरा मां के दिल में।
मिष्टी को 18 साल पहले तृषा ने जन्म तो दिया था लेकिन जीवन नहीं दे पाई थी। चौथे महीने में उसे बिना बताए बेहोशी की दवा खिलाकर घर वालों ने उसका एबॉर्शन करा दिया था क्योंकि तृषा बिन ब्याही मां बनने वाली थी।
दुनिया के लिए तो मिष्टी का अस्तित्व मिटा दिया गया था लेकिन तृषा के लिए उसका वजूद बना रहा। अपनी मां के दिल में वह पलती रही, बड़ी होती रही बातें करती रही।
तृषा के दिल में एक अलग ही दुनिया बस गई थी मिष्टी उसे अपनी तरफ खींच लेती तो कुछ पल सुकून के जी लेती तृषा और फिर लौट आती अपनी दुनिया में वापस। उस दुनिया में जहां उसका परिवार था जिसके लिए वो पागल थी, उसे इलाज की जरूरत थी। जब मिष्टी के नाम पर लोग चिल्लाने लगे तो तृषा ने सबके सामने उसकी बातें करनी बंद कर दी। लेकिन अकेले कमरे में दोनों मां बेटी जी भर के बातें करती। मिष्टी तृषा की हमराज भी थी और सबसे बड़ी आलोचक भी, दोस्त भी थी और फैशन गुरु भी। कभी मां बन कर डांटती है तो कभी आंसू पोंछती है, कभी हाथ से चॉकलेट छीन लेती है तो कभी कोल्ड कॉफी जबरदस्ती पिलाती है वो भी डबल आईसक्रीम डाल कर।
एक बिल्कुल ही सामान्य जीवन जी रही थी तृषा। पूरे शहर में काफी मान सम्मान था उसका बस जब वह अकेले अपने कमरे में होती तो मिष्टी उसके साथ होती थी।
आज जब वह हाथ में दो कोल्ड कॉफी का मग थामें अपने कमरे में आई तो उसके पति बहुत नाराज हुए चिल्लाते हुए बोले क्यों तृषा क्यों?
तुम जानती हो तुम्हारी कोई बेटी नहीं है यह सब क्यों?
तुम नॉर्मल नहीं हो बोलो डॉक्टर के पास कब चलोगी
तृषा ने कुछ नहीं कहा चुपचाप अपने कमरे में आकर पर्दे ढक कर लेट गई । उसने अपने आंखों को कसकर बंद किया और दोनों हाथों की उंगलियों में उंगलियां फंसा दिया।
बहुत स्याह दिन लग रहा था उसे अकेलापन और उदासी से भरा हुआ दिन। आज मिष्टी के बातों से भी उसका दिल नहीं बहल रहा था। मिष्टी ने धीरे से कहा मम्मा मान लो ना उनकी बात चली जाओ ना डॉक्टर के पास। वह आप का इलाज कराना चाहते हैं इसमें क्या प्रॉब्लम है मम्मा।
तृषा कुछ पल मिष्टी को देखती रही और बोली प्रॉब्लम है अगर इलाज कराया तो तू चली जाएगी।
मम्मा आप को याद नहीं मैंने कहा था ना मैं हमेशा आपके साथ रहूंगी ,मैं आज भी यही कह रही हूं मम्मा मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी कभी नहीं जाऊंगी।
डॉक्टरों के पास ऐसा कोई तरीका नहीं मम्मा जिससे वह एक मां के दिल से उसके बेटी(मिष्टी) को निकाल सके: मिष्टी बोली
तृषा मिष्टी की तरफ देखती रह गई ठीक ही तो कह रही है मिष्टी यह उसकी दुनिया है इसमें मिष्टी है और हमेशा रहेगी। यह सच नहीं बदलेगा।
हम बच्चे बड़े होते हैं तो मां से दूर चले जाते हैं लेकिन मां के दिल से तो वह दूर नहीं जाते।
अपनी आंखें पूछते हुए तृषा उठ कर बैठ गई। तृषा की आंखें गीली थी लेकिन उसमें से एक हल्की सी रोशनी झांकी जैसे काले बादलों के बीच से सूरज की किरणों से चीरती हुई निकलती है।
मिष्टी उसे देख कर मुस्कुराई और तृषा कुछ इतने खेत आज मैं भूली मम्मा और लाल वाली साड़ी पहनकर जाना।

अर्चना चौधरी (अर्ची)
रांची झारखंड

समीक्षा

बिटिया मां की दोस्त…एक ऐसी कहानी जो पढ़ने में एकदम फंतासी लगती है…. लेकिन इसके भाव कहानी की नायिका तृषा की उस व्यथा की…. कथा कहते हैं…. जिसके दर्द को दुनिया वाले महसूस भी नहीं कर पाते….. उल्टे उसको मनोरोगी मान लेते हैं….. । फंतासी दुनिया की ऐसी कहानी…. जिसका संबंध मनोविज्ञान से हो…. जिसका कोई इलाज …. मेडिकल साइंस के पास होने की संभावना बहुत कम हो……. उसको आखिर किस वैचारिक धरातल का आधार बनाकर लिखा होगा….? यह सवाल दिल और दिमाग में खलबली मचाने के लिए काफी है… लेकिन कहानी ने एक लेखिका की लेखनी की कोख से जन्म लिया है….. तो नारी होने के कारण लेखिका का अजन्मी सन्तान के प्रति प्रेम तो समझा जा सकता है…. परंतु अजन्मी सन्तान को एक पात्र के रूप में… जीवन भर जीना … यह बिंदु उस अभागी मां की ज़िंदगी की हकीकत हो सकती है….. उस परिवार का किस्सा हो सकता है जिसने तृषा जैसी मां के साथ समय गुजारा हो…. उस मनोविज्ञान के चिकित्सक का अनुभव भी हो सकता है… जिसके पास ऐसा रोगी अपना इलाज कराने आया हो….. ऐसे किसी भी परिस्थिति से गुजरे….. लोगों के अनुभव को लेखिका ने अपने शब्द और उनको अर्थ प्रदान किये हैं….। मिष्ठी के रूप में एक काल्पनिक बिटिया के साथ अपनी बातें साझा करना…. नायिका तृषा के रूप में दो चरित्रों को एक साथ जीना है… जिसमें सवाल भी खुद ही करना है… और उसके उत्तर भी काल्पनिक पात्र के माध्यम से खुद ही देना है… अजीबोगरीब परिस्थितियों का सामना करने वाले पति का चिड़चिड़ाना सहजता से समझा जा सकता है….।
यह तो हुई फंतासी कहानी की वास्तविकता….. लेकिन अभी उस हकीकत से बावास्ता होना बाकी है…. जिस दंश को झेलती हुई नायिका अपना जीवन जीने को मजबूर है….. अनचाही संतान से छुटकारा पाने के लिए परिजन अपने उपायों से…. पा तो लेते हैं…. लेकिन उस मां की रजामंदी के बिना…. तब वह माँ क्या करे…. जिसकी स्मृति से पहली संतान का जुड़ाव… छूटने को तैयार नहीं… उसी जुड़ाव ने मिष्ठी की कल्पना को साकार कर लिया…. और सुख दुख की हर घड़ी में… मिष्ठी एक औषधि की तरह असर दिखाने लगी…. सन्तान ने जन्म लिया या नहीं… लेकिन एक ऐसा रिश्ता जरूर पैदा हो गया …. जिसे पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर कभी मान्यता मिलना संभव नहीं है…..। गौरतलब बात यह है कि….. इस परिस्थिति से गुजरने वाली तृषा जैसी मां…. का अनपढ़ होना या उच्च शिक्षित होना कोई मायने नहीं रखता…. भावनाओं का महत्व आम जीवन में शिक्षा से ज्यादा है…. यह बात भी कथानक बहुत होले से कह जाता है… इस तरह के विषय पर कथानक गूंथना दुष्कर कार्य है… जिसे लेखिका अर्चना चौधरी की लेखनी ने बहुत ही सरलता और सहजता के साथ… कहानी में समाहित कर लिया…. इस काम के लिए बधाई तो बनती है अर्चना जी… बधाई हो….।

शैलेश तिवारी, सम्पादक

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!
Close