साहित्य का सोपान

मुझे बंदिशों में रहना पंसद हैं।

मुझे बंदिशों में रहना पंसद हैं।

मैं नहीं स्वछंद होना चाहती
मुझे रिश्ते निभाना पंसद है।

हाँ मैं उड़ना चाहती हूँ एक पक्षी की तरह
लेकिन लौट कर घर आना पंसद है।

कोई टोकता है मुझको जब
तब नखरे दिखाना पंसद है।

होना चाहती हूँ सशक्त मैं लेकिन
माथे बिंदियाँ सजाना पंसद है।

जब कहते हैं हमें पिछड़ा
तो मुझे पिछड़ जाना पंसद है।

करके हाथ आटे में गीले
गोल रोटियां बनाना पंसद है।

बातें सुनकर मासूमियत सी
मुझे बस माँ बन जाना पंसद है।

करके कुछ शृंगार
करना इंतजार पंसद है।

हाँ मैं स्त्री हूँ बस मुझे
प्यार लुटाना पंसद है।

नहीं चाहती जीना खुद के लिए
हाँ मुझे बंदिशों मे रहना पंसद है।

दिव्या शर्मा
गुरुग्राम, हरियाणा

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!
Close