साहित्य का सोपान

नारी पूज्यनीय … या सिर्फ भोग्या….

नारी पूज्यनीय … या सिर्फ भोग्या

जिस धरा पर यत्र नारी पूज्यन्ते तत्र रमन्ते देवता की बात की जाती हो। कविताओं में नारी को सोलह श्रृंगार करके कल्पनाओं के कोरे कागज पर लिखकर बखान करते हैं । उसी समाज में नारी की अस्मिता को तार तार करने से बाज नहीं आते।बस किताबों, कविताओं में ही उसे देवी का दर्जा ऊपरी मन से दिया जाता रहा है। जहां अच्छी सूरत दिखी नही की उसके पीछे पड़ जाते हैं । हर तरीके से उसे अपने जाल में फंसाने की कोशिश जारी रहती है एक बेवकूफ बनी नही की दूसरी को पटाने का माया जाल बिछाया जाने लगता है सभी महिला को पुरुष की इस मानसिकता को पहचानना होगा । बहुत सी महिलाएं इस मोह जाल में उलझ जाती हैं और वो इसी का नाजायज फायदा उठाते हैं (क्षमा चाहूंगी ये मैं सभी पुरुष के लिए नही कह रही) औरत को औरत नहीं मान कर उसे एक वस्तु क्यों समझा जाता है। उसके अस्तित्व को स्वीकार करने में पुरुष का कौन सा सम्मान कम हो जाता है । नारी ईश्वर की एक जीती जागती पूर्ण संरचना है । नारी सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा की प्रतिनिधि है। समाज और परिवार का विकास उसके त्याग, समर्पण और सहयोग के बिना अधूरा है इस सच्चाई को ये समाज कब समझेगा ? नारी को वस्तु भोग्या और दासी समझना बंद करो ।कहीं ऐसा न हो की एक दिन नारी के कोप का असर समाज पर पड़े और समाज छिन्न भिन्न हो जाए । स्त्री पुरुष के लगातार कम होते जा रहे अनुपात से इसको समझा जा सकता है जिसके कारण शादी ब्याह में दिक्कतें आने लगी हैं। आज नारी इस 21वीं सदी में भी शोषित हो रही है चाहे वो घर हो दफ्तर हो या वो समाज हो, हर जगह अवसरवादी पुरुष मौके की तलाश करता रहता है। जिस सभ्य समाज में हम सांस के रहे हैं उसी समाज का एक हिस्सा नारी भी है पुरुष जब गाली देता है तो उसके हर गाली में मां बहन को ही सम्बोधित किया जाता है आज तक गाली में कभी पुरुष का अपमान होते देखा या सुना है किसी ने, फिर सिर्फ औरत का अपमान क्यों? घोर आश्चर्य होता है।ये देख और सुनकर!!! हर गाली में तो नारी की इज्जत को ही उछाला जाता रहा है। ये दोहरा चरित्र समाज का कब बदलेगा समझ नही आता। लेकिन हम नारी शक्ति मिलकर एक दिन इसे जरूर बदलेंगे
तो आइए हम सभी महिला वर्ग ये प्रण लें कि समाज की ये मानसिकता जरूर बदलेंगे।

सुनीता पुनिया
नई दिल्ली

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