साहित्य का सोपान

इंतज़ार,,,

इंतज़ार,,,

प्रणय बेला का
बेसब्री से इंतजार था,,
कह के जो गए थे ,
कुछ ही
दिनों में आ जाऊंगा और तितली
की तरह इधर से उधर वो
भागती फिरती थी,,,
एक एक लम्हा जैसे एक
एक साल था ,,,इंतज़ार
में उसका बुरा हाल था,,
खूबसूरती,,जवानी,उस पर
पगली इतनी दीवानी,,,
पर,,पर,,,पर,,
कुदरत को शायद कुछ
और ही मंजूर था,प्रकृति का
फ़ैसला बेहद क्रूर था,,,
लोग झिंझोड़ रहे थे उसे,
होश में आ,,,
दिलासा दे रहे थे ,,,उसे,,,
टूट गए थे कंधे उसके ,,लोगों की
सांत्वना से, और वो अंदर से सीली
लकड़ी की भांति सुलग रही थी,,
ख़ामोश,, ,
मत छुओ ,,,मत छुओ,,
वो चींखना चाहती थी
चिल्लाना चाहती थी
इतनी तेज कि,,आसमान फट जाए
और वह कहीं लापता हो जाए,,
पर वो क्या करती बेचारी
बेहोशी में थी वो,, और
सिर्फ आवाज आ रही थी
चारों तरफ़ से,,
इतना ही साथ था
तेरा और उसका,,
बच्चों की तरफ देख,,अब
तु ही माँ बाप है इनकी,,
तु ही ज़िंदगी है इनकी,

सुषमा कुमारी साया
गुरुग्राम, हरियाणा

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