साहित्य का सोपान

दोस्ती करो पेड़ से…

दोस्ती करो पेड़ से

न काटो तुम पेड़ मानुष,
फूल कहाँ से आयेंगे |
बसंत के मौसम में यूँ,
अलि कहाँ गुनगुनायेंगे |

फूल-फलो से लदे ये पेड़,
देते हैं सब को छाया |
खिले फूल उपवन में जब,
फागुन मास हैं आया |

मंडराएँगी तितलियां कहां
चंन्द्रिका किस पे सोएगी |
न रहें साख पे पत्ते तो,
बूॅंदे किसे भिगोएंगी |

समीर किससे खेलेगी,
बरखा किसको छूएगी |
औढकर चुनर धानी भू,
संग किसके झूमेगी |

महंगा हुआ सलेन्डर तो,
काम आए फिर ईन्धन |
चुल्हा जलेगा जब कही,
जाकर पकेगा भोजन |

नदी सर सूख जायेंगे,
उपज हो जायेंगी नष्ट |
करो ना काम तुम ऐसा,
जीवन सहे जो फिर कष्ट |

-निहाल सिंह
झुंझुनू, राजस्थान

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