विशेष टिप्पणी

जलीयांवाला बाग के हत्याकांड से भी क्रूर नरसंहार

विशेष टिप्पणी

जलीयांवाला बाग के हत्याकांड से भी क्रूर नरसंहार
जयंत शाह

कहते हैं इतिहास दोहराया जाता है बस पात्र बदल जाते हैं । एक शहर में एक सुनार और एक लोहार की दुकान की थी।
लोहे पर जब हथौड़े की चोट होती थी बहुत जोर से आवाज आती थी।
और जब सुनार सोने के जेवर बनाने के लिए सोने पर हथौड़ी से वार करता था तब आवाज नहीं आती थी।
एक दिन एक लोहे का टुकड़ा और एक सोने का टुकड़ा दोनों पास में आकर गिरे सोने के टुकड़े ने लोहे के टुकड़े से पूछा।
मुझे भी हथौड़ी से चोट होती है मैं आवाज नहीं करता तुम्हें भी हथौड़े से चोट होती है तुम इतना शोर क्यों मचाते हो।
लोहे के टुकड़े ने बोला कि मुझ पर चोट करता है वह हथोड़ा भी लोहे का ही है इसलिए मुझे अधिक दर्द होता है क्योंकि दर्द देने वाला अपना ही है।

जलियांवाला बाग नरसंहार मे अंग्रेज हुक्मरानों ने क्रूरता पूर्वक मासूम जनता पर गोलियों से वार किया ।
जिसकी पूरे देश में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी. जनता द्वारा निंदा की गई एवं विरोध किया गया। और जो गुस्सा जनता में पनपा आखिर में अंग्रेजों को भारत छोड़ना ही पड़ा।
परंतु वर्तमान में अपने ही द्वारा चुने हुए हुक्मरानों द्वारा ना केवल किसानों का नरसंहार किया
बल्कि जिम्मेदार सत्ताधिशों द्वारा खतरनाक चुप्पी साध ली गई।
अपने ही देश के कुछ लोगों द्वारा मृतक शहीद किसानों एवं पीड़ितों को ही दोषी ठहराया जा रहा है। इसलिए यह घटना ज्यादा दर्दनाक है।
शहीद अन्नदाता को अश्रुपूर्ण विनम्र श्रद्धांजलि।

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