साहित्य का सोपान

गंध माटी की *********

गंध माटी की
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गेट पर ओला कैब जब आकर रुकी थी, संचिता ने सोचा भी नहीं था उसमें अजनबियों के रूप में कोई बहुत अपना उतरेगा।
नितांत अजनबी, लम्बी धवल दाढ़ी, कुर्ता-पायजामा पर नीली जाकेट और मैचिंग दस्तार में वो सरदारजी दरवेश लग रहे थे। उनके साथ एक बुजुर्ग महिला और एक जोड़ा अधेड़ उम्र का।
कॉलोनी में सबसे आगे व सड़क पर होने से इस घर में अक्सर पता पूछने वाले लोग आते रहते हैं।
नजदीक आकर सरदारजी ने दोनों हाथ जोड़कर नमस्ते की। उनका अनुसरण बाकी लोगों ने भी किया।
नमस्कार करते हुए संचिता की आँखों में उभर आये प्रश्नचिन्ह को पढ़ लिया था दार जी ने।
मैं अमरीक सिंह गिल और ये मेरी पत्नी सुखबीर हैं। यह बेटा हरजीत और बहू मनप्रीत है। हम लोग टोरंटो से आये हैं।
संचिता सोच रही थी पिछली लाइन में एक सिख परिवार रहता है जरूर उनके ही रिश्तेदार होंगे।
तभी दार जी ने कुछ देर बात करने की इजाजत चाही तो अपनी भूल पर झेंपी हुई संचिता को ‘अतिथि देवो भव:’ याद आया और एक तरफ़ हटकर उन लोगों के लिये रास्ता बनाते हुए अन्दर आने का कहा।
सभी लोग अन्दर आ गये और आराम से बैठकर बैग से पानी की बोतल निकाल कर पानी पिया।
पैदा होकर विदेश जाने तक यहाँ का पानी पीकर बड़े हुए लोग भी जब वापस लौटते हैं तो पानी बिसलेरी का ही पीते हैं। संचिता सोच रही थी मेहमानों की खातिरदारी कैसे करे तभी दार जी ने कहा। बेटा कोई 45 साल पहले हम भारत छोड़कर गये थे तब जीता छ: महीने का था।
उस वक्त यहाँ इकहरे बने मकान थे कुछ पक्के कुछ अधकच्चे। आगे सरकारी स्कूल था। वो सामने जो ऊँची-ऊँची इमारतें दिख रही हैं वहाँ खेत हुआ करते थे शक्कर कारखाने के जिनमें गन्ना उगाया जाता था।
वहीं लगा हुआ एक छोटा सा टुकड़ा स्कूल की जमीन का था जिसपर बच्चे बागवानी करते थे क्योंकि स्कूल तब कृषि विद्यालय हुआ करता था। मैं उसी स्कूल में कृषि का अध्यापक हुआ करता था।
जिस जगह पर तुम्हारा बंगला बना है ठीक इसी जगह पर एक कबेलुओं वाला घर होता था। पीछे एक बड़ा कमरा, उसके आगे दो कमरे फिर दहलान। दहलान के आगे आंगन फिर दो छोटे कमरे और थे जिसमें एक बैठक और दूसरा मेहमानखाना कह सकते हैं।
देहलान के पीछे का एक कमरा रसोई का था और बड़े कमरे में हमारा बिस्तर लगा था।
आंगन में हमने गुलाब और बेला के फूल लगा लिये थे जिनसे घर महकता रहता था। एक कोने में तंदूर हुआ करता था जिसमें सुक्खी रोटियाँ बनाती थी। पूरे स्टॉफ के लिए ताजी सब्जियाँ हमारे उसी खेत से आती थीं जहाँ बच्चों की प्रेक्टीकल की क्यारियाँ थीं।
जी हम तो यहाँ 5 साल पहले आये जब इस जगह पर हाउसिंग बोर्ड ने कॉलोनी बनाई। मेरे पति सिंचाई विभाग में इंजीनियर हैं। सामने के खेतों में प्राइवेट बिल्डर ने कालोनियां काटी हैं। बाकी तो मुझे ज्यादा जानकारी है नहीं इस जगह के बारे में।
आप कह रहे हैं कि इस जगह कभी आप रहा करते थे तो सही होगा।
हाँ जी पुत्तर जी, दार जी अब अनौपचारिक हो गये थे। संचिता को भी बड़ा अपनापन लगा इस संबोधन में।
मैंने तो देखते ही पहचान लिया था इस जगह को। फिर तहसील में मालूमात की तो सब पता चल गया। उस स्कूल की भी नई बिल्डिंग बन गई है और अब उसमें खेती नहीं होती। सरकार से वो जगह उसी बिल्डर ने ले ली जिसने कॉलोनी बनाई है।
संचिता की समझ में यह बात अभी तक नहीं आई थी कि दार जी इतनी पुरानी बातें क्यों कर रहे हैं और यह घर कभी उनका था कहने से उनका आशय क्या है। अब तो यह सरकारी जगह पर बनी कॉलोनी है और इस घर की बाकायदा रजिस्ट्री है रवि के नाम से।
और कनाडा से कोई क्यों आयेगा यहाँ इतनी दूर जमीन पर अपना हक जताने। वैसे भी यह बता रहे हैं वो घर स्कूल स्टॉफ के रहने के लिए थे मतलब तब भी यह जगह सरकार के कब्जे में ही थी।
आप लोग पानी तो हमारे देश का पीते नहीं, चाय-कॉफ़ी कुछ ले सकें तो मैं बनाऊँ?
देश तो हमारा भी यही है पुत्तर बस रोजी-रोटी के लिए परदेस गये और वहीं के होकर रह गये। बाप-दादा तो हमारे यहीं की मिट्टी में विलीन हुए हैं। इतने सालों से वहाँ का पानी पीने से शरीर आदी हो गया है उसी तासीर का। अब मिनरल वॉटर के अलावा दूसरा पानी हजम नहीं होता।
चाय में तो पानी उबल जाता है। चाय पीने में कोई परेशानी नहीं होती। अगर कोई तकलीफ़ न हो तो जरूर पियेंगे चाय।
तकलीफ़ कैसी? आप तो जानते ही होंगे हम मेहमान को भगवान का दर्जा देते हैं। फिर आप लोग तो इतनी दूर से आये हैं। मेरे पति के लौटने का भी वक्त हो रहा है। उनसे आपको और ज्यादा जानकारी मिल सकेगी क्योंकि वो यहीं पैदा होकर बड़े हुए हैं।
संचिता रसोई में जाने लगी चाय बनाने तो मनप्रीत ने साथ आने की इजाजत चाही।
क्यों नहीं! आइये आप। देखिए हम लोगों का किचन। संचिता ने कहा और मनप्रीत का हाथ थामे किचन में आ गई।
मनप्रीत बड़े गौर से देख रही थी ‘इंडियन किचन’ क्योंकि वो भारत पहली बार आई थी।
संचिता ने चाय बनाकर कप में छानी और मनप्रीत से पूछा कुछ स्नैक्स चलेंगे आप लोगों को। मनप्रीत ने बताया पकी हुई चीजों से परहेज़ नहीं है। बस पानी पीने से डर लगता है।
संचिता ने बैक्ड समोसे, कुछ नमकीन और बिस्कुट प्लेट में निकाले और बैठक में आ गईं दोनों।
रवि आ गये थे और दार जी से घुलमिल कर बातें हो रही हैं मतलब परिचय हो गया है। उस जगह और बदलाव के बारे में विस्तार से बता रहे थे रवि।
हरजीत भी पूरी दिलचस्पी से सुन रहा था रवि की बातें।
रवि ने अपनी बात पूरी की तो दारजी बोले, रवि साहब आपलोग सोच रहे होंगे कि हम इस तरह से आकर आपके घर में क्यों बैठ गए। आखिर क्या मकसद है हमारा इस तरह आने का।
जी…. आश्चर्य तो हो रहा है कि बिना जान पहचान आप आये हैं मगर आपके बारे में पुरानी बातें जानकर हम समझ सकते हैं। इतने सालों बाद आप भारत आये तो स्वाभाविक है उस जगह को देखना जहाँ रहे थे कभी। संचिता ने कहा।
नहीं पुत्तर जी! भारत आये तो इस जगह चलें ऐसा नहीं है। इस जगह की वजह से हम भारत आये।
ऐसी क्या खास बात है इस जगह में? रवि व संचिता ने एक साथ पूछा।
खास बात है। अगर आपको कोई ऐतराज नहीं हो तो हम इसके पीछे वाला कमरा देखना चाहेंगे। दार जी ने कहा।
ऐतराज़ कैसा? आइये देखिए ।वो हमारा गेस्ट रूम है।
सभी लोग उठकर लिविंग रूम से लगे गेस्ट रूम में आ गये।
जीते पुत्तर, यही है वो जगह जहाँ तू पैदा हुआ था। उस वक्त यहीं पर वो कमरा था जिसमें सुक्खी ने तुझे जन्म दिया था।
हरजीत ने जमीन पर लेटकर उस जगह को चूमा और नमन किया।
रवि और संचिता उसे ऐसा करते देख रहे थे।
हरजीत उठकर खड़ा हुआ और बोला “रवि आप बहुत खुशकिस्मत हैं जो अपने देश में रह रहे हैं। वहाँ परदेस में हम रह रहे हैं, खूब पैसा कमाया और कमा रहे हैं। ऐश-ओ-आराम की हर चीज है हमारे पास मगर वहाँ की मिट्टी पराई लगती है। मैं उस उम्र में यहाँ से चला गया था जब सोचने-समझने की शक्ति नहीं होती। जब समझने लायक हुआ तभी से लगता था उस जगह को देखूँ जहाँ मैंने जन्म लिया। और जैसे ही मौका मिला हम आ गये। यकीन मानिये मुझे यह जगह छू कर और इसकी महक से जो महसूस हो रहा है उसे मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता।”
सचमुच हरजीत की आँखें भीगी हुई थीं। दार जी, बेबे और मनप्रीत भी अपने आँसू पोंछ रहे थे।
हरजीत जी, अपने देश की अहमियत का अंदाजा हमें यहाँ से जाकर ही होता है। हम जो यहाँ रह रहे हैं पता नहीं कब समझेंगे कि न जाति न धर्म न कोई राजनैतिक दल बड़ा होता है, सबसे बड़ा अपना देश होता है। बहुत ख़ुशी हुई आपकी भावना और देशप्रेम देखकर। रवि ने कहा।
बिल्कुल सही कहा आपने रवि साहब। यहाँ रहकर अपने देश की माटी की गंध नहीं महसूस होती। दूसरे देश में जाकर यह सब याद आता है।
दार जी ने बैग खोलकर कुछ उपहार रवि व संचिता को दिये। संचिता ने भी मनप्रीत को कुछ दिया। और आइयेगा और आप भी कभी आयें टोरंटो के आदान प्रदान के साथ अजनबियों ने एक रिश्ते की डोर बाँधकर विदा ली।
रवि और संचिता गेट के बाहर खड़े होकर मेहमानों की कैब जाते देख रहे थे।
मुकेश दुबे, सीहोर, मप्र

समीक्षा

वादी हो कश्मीर की या
रेत राजस्थान की ….
हमको तो चंदन है
मिट्टी अपने हिंदुस्तान की…

…… क्या बात है मुकेश भाई … माटी की गंध कहां से कहां खींच लाई दार जी को…. संचिता ने उनसे कुछ संचित कर लिया…. तो रवि ने दार जी की जानकारी में कुछ प्रकाश बढ़ाया…..। क्या खूब लिखा भाई आज का कथानक…. वाकई ये मिट्टी की तासीर बड़ी निराली और गज़ब की है… इसी आबो हवा वाली मिट्टी की कोख से पैदा हुआ पुष्प भी बलिदानी अभिलाषा रखता है… तब दादा माखनलाल चतुर्वेदी उस की बोली को समझते हैं और उसे शब्द दे देते हैं कि….

मुझे तोड़ लेना वनमाली
उस पथ पर तू देना फेक
मातु भूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जाएं वीर अनेक…

…. ऐसे पुष्प को जन्म देने वाली माटी की गंध से महक उठा होगा जीते का कनाडा वाला जीवन… और चल पड़ा …. उस माटी को प्रणाम करने जिस धरा पर उसने जीवन की पहली सांस ली थी….। वर्तमान की राष्ट्रीय परिस्थितियों में यह कथानक…., अपने आप में बहुत कुछ ऐसा कह जाता है… जिसे हम इसी माटी में रहते हुए महसूस नहीं कर पाते … और….
मलयागिरि की भीलनी चंदन देय जलाए… की तर्ज पर चंदन के महत्व से अनभिज्ञ रहते हुए चंदन की लकड़ी पर रोटी सेंकते रह जाते हैं…। उसी तरह राष्ट्र की चिंता किए बगैर तमाम राजनेता द्वारा अपनी अपनी राजनैतिक रोटियों का आपने कथानक में जिक्र भी किया….।
आपकी कथानक से इस बार बहुत खास संदेश अनकहा से है… जो मुझे सुनाई दे रहा है…। वह यह कि हमारी व्यवस्था ने अभी तक राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण नहीं किया…. जो कुछ भी उपलब्धियां विभिन्न क्षेत्रों में हासिल हुई वह व्यक्तिगत रहीं….. क्रिकेट, सिनेमा, विज्ञान, मेडिकल, मैनेजमेंट, उद्योग, आदि आदि अनेकानेक क्षेत्रो में प्राप्त उपलब्धियां नितांत निजी हैं….. राष्ट्रीय नहीं… जबकि राष्ट्रीय चरित्र जापान, चीन, फ्रांस, इजरायल आदि अन्य देशों में निर्मित किया गया…।वही फर्क नजर भी आता है… हम बंगाली, गुजराती, मद्रासी, मराठी आदि सब बने…. परंतु हाय रे … भारतीय क्यों न बन पाए…। कितना प्रेरणादायी कथानक आपने रच दिया भाई.. बहुत बहुत बधाई..। साथ ही जन्म दिन की भी बधाई।

शैलेश तिवारी,संपादक

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