साहित्य का सोपान

मेरी अमृता

मेरी अमृता

अमृता और इमरोज़ जैसा प्रेम,
कौन‌ करता है आज।
जानते थे दोनों,
मिलन नहीं होगा परन्तु,
दोनों अपनी-अपनी
मोहब्ब्त के मुरीद थे।
इमरोज़ जानता था,
अमृता केवल उसका एक ख्वाब थी।
अमृता जानती थी,
साहिर उसका कभी ना पूरा होने वाला सपना था।
इमरोज़ और अमृता भी ,
नदी के दो किनारे जैसे थे।
वह नदी, शायद साहिर थी।
जो दोनों के बीच बह रही थी।
अमृता उस नदी संग बह रही थी।
और इमरोज़ भी किनारे-किनारे,
अमृता के साथ चल रहा था।
परन्तु कुछ तो था ,
अनोखा,अद्भुत,
कुछ पवित्र।
जिसकी कसम खा लेने का
दिल करता है।
ना ऐसा प्रेम किसी ने किया होगा,
ना हिम्मत किसी में इतनी कि,
अमृता जैसा सत्य लिख पाए।
हां ,शायद यही सच्चा प्यार था।
उम्र और रिश्तों के
बांध तोड़कर बह गया।
हां,यही सच्चा प्यार था जो,
अमृता ने किया और लिखा।

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विशेष:- मेरी अमृता …. शीर्षक की उक्त कविता को इस बार कवियत्री वंदना जी द्वारा पंजाबी भाषा में भी भेजा गया है। एम पी मीडिया पॉइंट अपने हिंदी और पंजाबी दोनों भाषाओं में रुचि रखने वाले पाठको के लिए दोनों भाषाओं की कविता को प्रकाशित कर रहा है।

मेरी अमृता (पंजाबी)

अमृता ते इमरोज़ जिहा प्यार,
कौन करदा ऐ अज ।
जानदे सी दोनों ,
मिलन‌ नहीं होना पर,
दोनों अपनी-अपनी
मुहब्बत दे मुरीद सन।
इमरोज़ जानदा सी ,
अमृता केवल उसदा ख्वाब सी।
अमृता जानदी सी,
साहिर उसदा कदी ना पूरा होन वाला
सुपना सी।
इमरोज़ ते अमृता वी ,
नदी दे दो किनारे वांग सन।
ओह नदी,शायद साहिर सी।
जो दोवां दे विच बह रही सी,
अमृता,उस नदी नाल बह रही सी।
ते इमरोज़ वी किनारे-किनारे,
अमृता नाल चल रिहा सी।
पर फिर वी, कुछ तां सी,
अनोखा,अनडिठा जिहा,
कुछ पवित्र।
जिसदी सोंह खा लैन दा
दिल करदा ऐ।
ना अजिहा प्यार किसे कीता होना,
ना जिगरा किसे विच ऐना कि,
अमृता जिहा सच बोल ते लिख देवे।
हां,शायद ऐहो सच्चा प्यार सी।
उमरां ते रिशतिआं दे
बन तोड़ के,बह गिया।
हां,ऐही सच्चा प्यार सी जो,
अमृता ने कीता ते लिखिआ।

कौशल बंधना पंजाबी
नंगल डेम, पंजाब

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