साहित्य का सोपान

अपना अपना मंदिर…

अपना अपना मंदिर

दो मित्रों को जीवन से विरक्ति हो गई और वे जीवन में शान्ति की खोज में साथ साथ निकले कि शायद कहीं शांति मिले । दोनों के रास्ते अलग हो गये और वापस इसी जगह मिलने का वादा हुआ ।
जब वापस मिले तो पहले वाला अपने साथ मित्र को लेकर अपने ठिकाने पर गया । चौराहे के बीचों बीच एक विशाल पीपल के वृक्ष के नीचे कुछ मूर्तियाँ रख कर मंदिर बना लिया था , उसमें ही अपने रहने के लिए सुविधायुक्त घर भी बना लिया था । बड़ी शान से बताया कि धर्म का धर्म और मुफ्त रहने का ठिकाना । बड़ी शांति मिलती है । और तेरा क्या हाल है ?
दूसरा वाला उसे वहाँ से दूर एक वृद्धाश्रम में ले गया , जहाँ पर कई बुजुर्ग अपने अपने कार्यों में व्यस्त थे और कई युवा भी उनके कार्यों में सहायता कर रहे थे । पहला पशोपेश में कि ले कहाँ आया है ?
“यहाँ मंदिर क्या अंदर बनाया है ?”
“नहीं , यही तो मेरा मंदिर है , ये परिजन परित्यक्त बुजुर्ग हैं और इन्हें यहाँ लाकर रखता हूँ , मेरे पीछे ये भक्त अपनी सेवायें देते हैं ।”
“ये क्या बात हुई न पूजा न पाठ , न भजन कीर्तन ? ये कोई मंदिर हुआ ?”
“ये मानव मंदिर है , इनके अंदर भी ईश्वर है और उन्हीं को मैंने पूजने का कार्य चुना है ।”
” ये तो धर्म , मंदिर और ईश्वर के साथ मजाक है ।” पहला उत्तेजित हो चुका था ।
“कभी धर्मग्रंथ पढ़े है , ईश्वर हर जीव में ही है और असहाय की सेवा ही सबसे बड़ी पूजा ।” कहकर वह पीछे पलटा तो पहला जा चुका था ।

रेखा श्रीवास्तव
कानपुर, उप्र

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!
Close