साहित्य का सोपान

विडंबना…

विडंबना

“रात के बारह बज चुके है पर नींद आँखों से कोसों दूर है । सुबह हिंदी दिवस पर छोटे छोटे बच्चों को हिंदी की महत्ता के बारे में बताना है ।
कितना विषम होता है ना आज के छोटे छोटे उन बच्चों को हिंदी के महत्त्व के बारे में बताना जो फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी बोलते है और सहजता से पूछते है कि हिंदी हमारे जीवन में कितनी काम आएगी ?
मैं अपने नौ वर्षीय बेटे को यह बात समझाने में अभी तक विफल ही रही कि अच्छे से हिंदी लिखना, पढ़ना और बोलना क्यों ज़रूरी है ? बोलने में उन्हें बहुत आसान लगती है पर उससे अधिक दिक्कत पढ़ने और फिर उसके बाद हिंदी लिखना तो उनके लिए शायद संसार का कठिनतम कार्य होता है । बच्चे द्वारा एक पेज हिंदी लिखना मतलब “पहाड़ तोड़ने जैसा ही है।”

यह सब सोचते सोचते कब आँख लग गई पता ही नहीं चला और जब आँख खुली तो पता चला कि जो देखा वो तो महज़ एक सपना था ।
कई बार गहरी नींद में देखे गए स्वप्न आपको नयी शुरुआत की ओर अग्रसर करते हैं।

दिन की शुरुआत का ही समय था और मैं स्कूल जाने के लिए तैयार हो ही रही थी कि घर के दरवाज़े की घंटी बजी । सूती साड़ी पहने हुए एक औरत घर में प्रवेश करने की इजाज़त माँग रही थी । अपने हाथ से अंदर आने का इशारा करते हुए मैंने उन्हें आमंत्रित किया । सामान्य शिष्टाचार वश अभी चाय पानी पूछती ही कि वह बैठते ही ज़ोर ज़ोर से….अचानक…रोने लगी। उसकी हालत देख मुझे लगा शायद उसे पैसा चाहिए और जैसे ही मैंने उसे पैसे के लिए पूछा तो उसने साफ़ मना कर दिया कहा, कि सरकार की बहुत सारी योजनाएँ है मेरी और मेरी जैसी बहनो के लिए उसकी आवश्यकता नहीं है । मैं फिर सोच में पड़ गई और मैंने सीधे सीधे पूछ ही लिया क्या आपको आपके घरवालों से या किसी अन्य से कोई परेशानी है तो उसने कातर भरी निगाहों से मुझे देखा जैसे मैंने उसकी दुखती रग पकड़ ली हो । मैंने फिर उसे उम्मीद भरी निगाहों से देखा और दिलासा देते हुए कहा, कि आप चिंता मत कीजिए, मैं पूरी कोशिश करूँगी कि आपकी समस्या का समाधान कर सकूँ । क्या आप अपनी समस्या विस्तार में बताएगी ? उसने कहा इतना समय नहीं है कि विस्तार में बता पाऊँ और एक बात और कि आप अकेली कर भी नहीं पाएगी, मेरी समस्या हल करने के लिए आपको अपने साथ बहुत सारे लोगों को जोड़ना होगा ।

मैंने उसे ढाँढस बाँधते हुए, फिर कहा कि आप चिंता मत कीजिए, कहिए तो सही ।
फिर उसने मुझसे कहा, “माँ बनना दुनिया का विषम काम है पर अपनी माँ को जन्म देना उससे भी विषम कार्य है” ।
मैं अभी कुछ समझती उसके पहले ही वह कहने लगी कि एक माँ के लिए इससे बड़ा अपमान क्या होगा कि उसकी उपस्थिति के बावजूद उसे घर के एक कोने में रख दिया हो…. जिन्होंने पीड़ाओं में सबसे पहले मुझे पुकारा आज वही झूठी शान के लिए दुत्कार रहे है …. क्या तुम कल्पना कर सकती हो कि एक बच्चा ही अपने फलने फूलने में अपनी माँ को बाधक माने ? कोई माँ नहीं चाहती कि उसके बच्चों का विकास ना हो पर वह यह भी नहीं चाहती कि उसे संगरोध (क्वॉरंटीन ) करके एक कमरे तक सिर्फ़ इसलिए सीमित कर दिया जायें कि वह बीमार है कहीं उसके संक्रमण से भविष्य ख़राब ना हो जाएँ । इतना कहते कहते वह फूट फूट के रोने लगी और चेतावनी देते हुए निकल पड़ी कि…..

एक भाषा का गहरी नींद में सो जाना…
सभ्यता का सबसे बड़ा दु:स्वप्न है ।।

हर्षिता पंचारिया, नागपुर, महाराष्ट्र

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!
Close