सीहोर

सीख लम्हों की…

सीख लम्हों की

श्रुति हाथ में एटीएम कार्ड लिए सोच रही थी कि इसका कैसे उपयोग करे । बहुत दिनों से सभी कार्ड रखे थे , उसने इस्तेमाल करने की हिम्मत न की । बेटा इतना ध्यान रखता कि कभी पैसों की ख़ुद से ज़रूरत ही न पड़ी ।

इन दिनों टूट सी गयी थी श्रुति , पति ने जीवन – मँझधार में जो छोड़ दिया था । उनका भी क्या दोष ? दोनों का साथ क़िस्मत ने यहीं तक लिखा था । उसके पति ने उसको इतने प्यार से सहेज के रखा था कि उसे दुनियादारी की बातों का कभी ख़याल ही न रहा । सारी ज़िम्मेदारी वे बड़ी शिद्दत से पूरी करते ।

उसे याद आ रहा था कि उसके पति उसको बैंक से सम्बंधित कितनी बातें समझाने की कोशिश करते थे , कितनी बार एटीएम कार्ड को कैसे उपयोग में लाते हैं , और ऑन लाइन पैसे कैसे ट्रांसफ़र करते हैं , सिखाना चाहा … पर मस्त – मलंग श्रुति इन बातों से अपने को दूर ही रखती । कहती, आप तो हैं न मुझे क्या करना सीख कर ।

आज अपने इस फ़ैसले पर वो दिल से दुखी थी , जब आज कुछ रुपए किसी ज़रूरत मंद को ऑन लाइन ट्रांसफ़र करने थे और वो अपने को बेबस पा रही थी । बच्चे भी घर से बाहर गए थे कई दिनों के लिए और वो भी तो पराए शहर में बैठी थी । अपना शहर होता तो बात बन जाती ।

सच इन लम्हों की सीख ने उसे बता दिया कि स्त्रियों और लड़कियों को घर – बाहर के सभी कार्य आने चाहिए ताकि हर परिस्थिति का वे सामना कर सकें ।

नलिनी श्रीवास्तव ‘ नील ‘
नई दिल्ली

समीक्षा

समय रहते अपने दौर का व्यवहारिक ज्ञान…. हासिल नहीं करने का खामियाजा कभी न कभी भोगना ही पड़ता है….। सीख लम्हे की …. ऐसे ही कथानक का नाम है..जिसकी नायिका श्रुति सही समय पर सही निर्णय नहीं कर पाई….. और आश्रित रही अपने पति पर…… समझ में मामला जब आया तो देर हो चुकी थी….. जीवन की नैया अकेले ही खेने की नोबत आ गई.. अब संशय युक्त उलझन उसके सामने है….जो गृहस्थ महिलाओं के लिए सीख भी है …. और सबक भी…..। इस लघु कथा को अगर कहानी का रूप दिया जाता तो…. समय से न सीख पाने की समस्या का…. समय आने पर सीख लेने का समाधान हो जाता….। यह भी स्पष्ट होता कि… ऐसी स्थिति में किन लोगों पर भरोसा जताना है…. किस तरह के लोगों से दूर रहना है…..। बताइए न…. कहानी का रुतबा और बढ़ जाता न…..। वैसे आलेख परक लघुकथा में एक सही और सामयिक मुद्दे पर चर्चा है…. जो सार्थक भी है…..।

शैलेश तिवारी , सम्पादक

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