साहित्य का सोपान

प्रेम का अनकहा हिस्सा….

प्रेम का अनकहा हिस्सा

तुम्हारे प्रेम का एक अनकहा हिस्सा
कुछ मुड़ा तुड़ा सा कुछ कुछ फटा सा
संभाल कर आज भी मेरे पास रखा है
जब चाहो तब अपने साथ ले जाना

बुने जो प्रेम के खुबसूरत ख्वाब हमने
कुछ आधे अधूरे से कुछ मुक्कमल
सब यूं ही आज तक मेरे पास रखे हैं
जब चाहत हो तब आकर देख लेना

गुलमोहर की नन्हीं नन्हीं शाखो पर
बयां कोयल की सुरीली चहचहाहट
साक्षी है साथ गुजारे रूहानी पलों की
जब जी चाहे यादें ताजा कर लेना

कुंवारे मन के अनछुए अनोखे भाव
नयनों में तरल होकर अविरल ‌बहते हैं
वो आज भी वही पर यूं ही जमा है
जब चाहो तब तसल्ली कर जाना

सांझ के जादू में खोया हुआ मन
हलकी छुअन से सिहर गया था
वो स्पर्श गहरे अंतस में छिपा है
तुम उसे ढूंढकर अपने साथ ले जाना

ढलती शाम के आसमां का सिंदूरी रंग
निहारा था साथ मे एक दूजे के संग
छत का वह कोना आज भी अकेला है
हो सके तो कुछ वक्त वहां रख जाना

विदा के उस अंतिम क्षण मे अक्षुण्ण सा
आंखों से गिरे वो कुछ सुखे कुछ गीले लम्हे
सूखा तो गुम हुआ गीला मेरे पास रखा है
आते जाते उसे समेट कर साथ ले जाना

शोभा गोयल, जयपुर, राजस्थान

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