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प्रेम…

प्रेम वो नहीं जो तुमने किया
अपनी सुविधा के अनुसार
बल्कि प्रेम वो था
जो तुम्हारे पास समय की
कमी के कारण
तुम्हारे आफिस की फाइलों में बंद रहा
और मैं दिन महीने साल दर साल प्रतीक्षारत रही

अक्सर शाम चाय चढ़ाते समय
जब मैं तुम्हे पूछा करती थी
आज कितनी बार चाय हो गई
तुम झूठ कहते थे हर बार
पर पूरे दिन की दिनचर्या में
जितनी बार तुम्हें याद करती
प्रत्येक बार एक बूंद चाय की
तुम्हारे होंठ से मेरे होंठों तक का
सफर तय करती

अलमारी में है आज भी खाली
लाल रंग की साड़ी की जगह
जितने फिक्र से टटोलती थी
तुम्हारा बटुवा
उतनी ही बेफिक्री से
प्रत्येक बार मांगती थी तुमसे
हर त्यौहार में घुले रंग की भाँति
पहनी साड़ी सी
तुम्हारे प्रिय रंगों को बदलता देख
मैं हर बार मुस्कुराती थी
मन ही मन

प्रेम वह था जो मैंने
अभावों में भी है जिया
तुम्हारे छोड़ कर चले जाने के बाद भी
उपहार में तुम्हारे दिये हुए
आंसुओं को
तुम्हारी बदनामी के भय से
कभी अपनी आंखों से बहने नहीं दिया
यद्यपि हृदय से उठती हुंकार पर
हर बार मेरे होठों पर
विरह का एक गीत रख दिया
और मैने उसे ही अपना
जीवन का संगीत मान लिया

सरिता शैल, कारवार, कर्नाटक

परिचय

सरिता सैल वर्तमान में कारवार कर्नाटक में निवासरत हैं और कॉलेज में प्रोफेसर होने के साथ साथ आप हिंदी साहित्य की सेवा जे लिए भी समय देती हैं। इसके साथ आप कोंकणी, मराठी एवं अंग्रेजी भाषा में कविताओं का अनुवाद करती हैं। आपका एकल संग्रह “कावेरी एवं अन्य कवितायेँ” तथा साझा संग्रह – कारवाँ में कविताएं प्रकाशित हो चुका है। कोंकणी भाषा से हिंदी में एक उपन्यास का अनुवाद प्रकाशनाधीन है। आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती है। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।
सम्पादक

एक नजर

विरह के गीत को जीवन का संगीत मानकर जीने वाली प्रेयसी का कथ्य है कविता…… प्रेम….। जिसे सरिता सैल जी की कलम ने रचा है…. । जिसमें न तो अधूरा प्रेम है और न ही प्रेमी से दूरी है…. बल्कि उससे उलट दाम्पत्य जीवन के प्रेम की कथा की उस व्यथा का वर्णन है…. जो पति पत्नी होते हुए साथ साथ तो है…. लेकिन पास पास नहीं है… जो ठीक रेल की उन दो पटरियों की याद दिलाती हैं जो साथ साथ रहते हुए भी…. नदी की दो किनारों की तरह पास पास नहीं होते…..। दफ्तर की फाइलों में व्यस्त पति…. और उसके आने पर चाय की चुस्की में भी प्रेम खोजती पत्नी…. आज के दौर के दाम्पत्य जीवन की दास्तां का एक दस्तावेज सा साबित होती है कविता….। पत्नी रूपी प्रेयसी के प्रेम के दो पल चुराने के इंतजार में उम्र के उस पड़ाव तक का सफ़र तय कर लेती है…. जहां से जीवन साथी का मोड़ मुड़कर बिछड़ जाना निश्चित होता है…. और स्थाई विरह की इस वेदना के गीत में… जीवन का संगीत खोज कर …. दिल बहलाने का अच्छा और सकारात्मक ख्याल भी इस में शामिल है…।
सीधे सरल शब्दों की यह कविता… गुजिस्ता वक्त की जगह …. आज को व्यक्त करती एक सशक्त रचना है… जो भले ही हिंदी काव्य के परंपरागत मान्य मापदंडों में न लिखी गई हो…. लेकिन अपना पुरजोर असर छोड़ने में कोई कोर कसर नहीं बरतती है….। बढ़िया रचना के लिए बधाई सरिता जी….।

शैलेश तिवारी, सम्पादक

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