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कलम के तूफान को सलाम…

जयंती- स्व. दुष्यन्त कुमार की

प्रसंगवश
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मेरे सीने मेें नहीं तो तेरे सीने सही,
हो कहीं भी आग लेकिन सुलगनी चाहिए।

जयंत शाह

जिनके अल्फाजो़ से कुर्सियां हिलने लगे, सिंहासन डोलनें लगे, युवाओं का रक्त खोलने लगे, व्यवस्था शब्दों से सुधरने लगे, ऐसे महान लेखक,कवि,गजलकार स्व. दुष्यन्त कुमार को आज उनकी जयंती पर याद करते हुए मै गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ। जिन विपरीत परिस्थितियों में शब्दों के सहारे दुष्यन्त कुमार ने व्यवस्था के खिलाफ जंग लड़ी वह अद्भुत और अद्वितीय है। दुष्यन्त जी की मृत्यु पश्चात उनकी पत्नी राजेश्वरी का भी मैं जिक्र इसलिए करना च‍ाहूंगा कि साहित्य सामग्री को प्रकाशन में उनका विशेष योगदान रहा।
जब कवि किसी घटना या उस समय के हालात को देखकर कोई रचना लिख देता है .और उसमें किसी पात्र का नाम नहीं लिखता वह रचना कालजयी बन जाती है.
आज कविवर दुष्यंत कुमार का जन्मदिन है.
दुष्यंत कुमार की रचनायें हर समय के हालात पर सटीक रहती है।
दुष्यंत जी की कुछ रचनाएं तो हर आंदोलन में सामूहिक रूप से गायी भी गई हैं ,और गाई जाती रहेंगी।
आज दुष्यंत जी के जन्म तिथि 1 सितंबर पर दुष्यंत जी की यह गजल
जो आज के हालत पर मौजू है।
प्रस्तुत है….

हालाते जिस्म, सूरते-जाँ और भी ख़राब
चारों तरफ़ ख़राब यहाँ और भी ख़राब

नज़रों में आ रहे हैं नज़ारे बहुत बुरे
होंठों पे आ रही है ज़ुबाँ और भी ख़राब

पाबंद हो रही है रवायत से रौशनी
चिमनी में घुट रहा है धुआँ और भी ख़राब

मूरत सँवारने से बिगड़ती चली गई
पहले से हो गया है जहाँ और भी ख़राब

रौशन हुए चराग तो आँखें नहीं रहीं
अंधों को रौशनी का गुमाँ और भी ख़राब
आगे निकल गए हैं घिसटते हुए क़दम
राहों में रह गए हैं निशाँ और भी ख़राब

सोचा था उनके देश में मँहगी है ज़िंदगी
पर ज़िंदगी का भाव वहाँ और भी ख़राब

और अंत में
दुष्यन्त मरे नहीं , दुष्यन्त मरते नहीं
एमपी मीडिया पॉइंट की तरफ से सादर नमन

जयंत शाह, सीहोर

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